बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति हमेशा से चर्चा का विषय रही है और ताजा घटनाक्रम ने फिर से एक बार इस चर्चा को तेज कर दिया है। पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पटना से गिरफ्तारी ने इस बहस को हवा दी है।
पटना पुलिस ने 31 साल पुराने मामले में पप्पू यादव को गिरफ्तार किया, जो 1995 में दर्ज हुआ था। यह मामला जमीन विवाद और धोखाधड़ी से जुड़ा है। लेकिन गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठ रहे हैं इसलिए क्योंकि पप्पू यादव ने छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत पर पुरजोर तरीके से सवाल उठाए हैं। इस मामले में बलात्कार और हत्या के आरोप भी लगे हैं।
जहानाबाद की रहने वाली यह छात्रा पटना के एक छात्रावास में नीट की तैयारी कर रही थी। 11 जनवरी को उसकी संदिग्ध हालातों में मौत हो गई। सांसद पप्पू यादव ने छात्रावास प्रबंधन, अस्पताल की व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने परिवार से मुलाकात की, न्याय की मांग की और राज्य सरकार की आलोचना की थी।
पप्पू यादव की गिरफ्तारी पर उठ रहे आरोपों को और भी बल तब मिल गया जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उनकी गिरफ्तारी को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया। प्रियंका गांधी ने जांच में लापरवाही बरतने और अपराधियों को बचाने का आरोप लगाया। गिरफ्तारी की कार्रवाई को पप्पू यादव ने मीडिया से बताया कि सिविल ड्रेस में पुलिसकर्मी आते हैं और क्रिमिनल जैसा व्यवहार करने लगते हैं।
नीतीश कुमार 20 साल से बिहार की सत्ता में हैं और 31 साल बाद अगर किसी मामले में कार्रवाई होती है तो यह और भी बड़ा सवाल है। और अगर यह मामला इतना ही गंभीर था तो इसकी भी जवाबदेही तय करनी चाहिए कि इतने साल से कार्रवाई ठंडे बस्ते में क्यों पड़ी रही?
इस कार्रवाई को राजनीतिक निहितार्थ के चश्मे से भी देखे जाने की जरूरत है। क्या ठीक ऐसे समय में पुराना केस खोदकर सांसद की गिरफ्तारी करना सरकार की असहजता का प्रमाण नहीं?
इस मामले को लोकसभा अध्यक्ष को भी संज्ञान में लेना चाहिए। संसद का सत्र चल रहा है बीच में छुट्टी है। ऐसे में सांसद को वह भी मध्य रात्रि में हाई वोल्टेज ड्रामे के साथ गिरफ्तार कर लिया जाना कितना जायज है?











