नारी शक्ति बिल के नाम से संसद में पेश किए गए महिला आरक्षण संशोधन बिल पर लोकसभा में मतविभाजन के कुछ घंटे पहले आई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सांसदों से की गई ‘अंतरात्मा की आवाज पर वोट’ डालने की अपील से ही साफ हो गया था कि सरकार के पास सदन में दो तिहाई बहुमत नहीं है।
सरकार भले ही बिल के गिरने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़े और उस पर आरोप लगाए कि वह नहीं चाहता कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण मिले, लेकिन इस बिल का सदन के भीतर जो हस्र हुआ है, उसने सरकार की नीयत और उसकी कमजोर रणनीति, दोनों को उजागर कर दिया है। दरअसल सरकार महिला आरक्षण संशोधन बिल की आड़ में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में प्रस्तावित परिसीमन को लागू करवाना चाहती थी, जिसे विपक्ष ने एकजुट होकर खारिज कर दिया।
2014 में सत्ता में आने के बाद पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है, जब मोदी सरकार को सदन के भीतर अपनी कमजोरी का एहसास हुआ होगा। वरना 2023 में जब महिलाओं को विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण देने से संबंधित बिल लगाया गया था, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने पूरी सहमति से उसे पारित कर दिया था।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी और द्रमुक सांसद लगातार जोर दे रहे थे कि सरकार 2023 के बिल को तुरंत लागू कर दे, लेकिन सरकार इसे परिसीमन के साथ जोड़कर ही लागू करना चाहती थी, मगर उसकी यह बाजीगरी काम नहीं आई।
दरअसल मुश्किल यह है कि मोदी सरकार ने 2021 में प्रस्तावित जनगणना को टाल रखा था और अब जबकि 2026 में जनगणना होनी है, तो पूरी तस्वीर साफ नहीं है। सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा कर रखी है, लेकिन अंतिम आंकड़े 2027 में ही आएंगे। मगर सरकार जनगणना से पहले ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों में बढ़ोतरी करना चाहती थी, जिसका द्रमुक सहित तमाम विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।
मोदी सरकार इन तीनों बिलों को बकायदा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक ऐन पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित करवाना चाहती थी, जिसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं। सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठते हैं, क्योंकि उसने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को सदन के भीतर दो तिहाई बहुमत नहीं मिलने पर बाकी के दो विधेयकों पर मतदान के लिए रखा ही नहीं। क्या इसकी वजह यह भी है कि परिसीमन विधेयक पर मोदी सरकार में शामिल तेलुगू देशम पार्टी के कुछ सांसद टूट सकते थे? आखिर इस विधेयक के खिलाफ दक्षिण भारत से ही ज्यादा आवाजें उठ रही हैं।
लोकसभा में आज जो कुछ हुआ, उसके दो संदेश साफ हैं, पहला यह कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 240 सीटों पर सिमट जाने वाली भाजपा तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल (यू) के सहयोग से सरकार में है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की छवि कमजोर पड़ चुकी है और उनकी अंतरात्मा की अपील भी सरकार के काम नहीं आई है। दूसरा यह कि अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सदन के भीतर विपक्ष एकजुट है। इसका यह भी मतलब है कि मोदी सरकार के लिए संसद में आगे आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी।











