रायपुर। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का 7 फरवरी से प्रस्तावित छत्तीसगढ़ दौरा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसे देश की आंतरिक सुरक्षा रणनीति के सबसे निर्णायक चरण के रूप में देखा जा रहा है। वजह साफ है – 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे की तय डेडलाइन और उससे ठीक पहले शाह का तीन दिन का यह गहन दौरा।
अमित शाह के दौरे को लेकर छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज एक बार फिर मुखर हैं। दीपक बैज ने द लेंस से कहा कि नक्सलवाद का खात्मा जरूरी है, लेकिन यहां केंद्र सरकार के लिए नक्सली सिर्फ एक बहाना है। वे दावा करते हैं कि सरकार की नजर बस्तर के जल, जंगल और जमीन पर है। इस दावे के साथ वे सवाल करते हैं कि क्या अमित शाह बस्तर के लोगों को इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि वे अपने उद्योगपति दोस्तों को बस्तर के जल जंगल जमीन नहीं बेचेंगे?
इतना कहकर दीपक बैज केंद्र सरकार की मंशा पर जरूरी सवाल खड़े कर रहे हैं।
दूसरी तरफ बस्तर केंद्र सरकार के लिए कितना अहम है उसका अंदाजा राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धन्यवाद प्रस्ताव भाषण से समझा जा सकता है, जिसमें इंप्लिमेंटेशन की बात करते हुए पीएम मोदी ने बस्तर में हो रहे बदलाव का जिक्र किया।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट लक्ष्य रखा है कि मार्च 2026 के अंत तक देश से वामपंथी उग्रवाद (LWE) को निर्णायक रूप से समाप्त किया जाए। छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर सरकारों के लक्ष्य का केंद्र है क्योंकि हाल के कुछ सालों पहले माओवादियों की ताकत यहीं नजर आई थी। हालांकि अब भी सीमित क्षेत्रों में नक्सली नेटवर्क सक्रिय हैं।
अमित शाह अपने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान लगातार तीन दिनों तक प्रशासनिक और सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठकें करेंगे। इन बैठकों में एक ओर जहां एंटी नक्सल ऑपरेशन पर समीक्षा की जाएगी, वहीं दूसरी ओर ‘बस्तर के विकास मॉडल’ को लेकर भी विस्तृत चर्चा होगी।
छत्तीसगढ़ पुलिस महकमें के अफसर बता रहे हैं कि बैठक के दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में चल रहे सुरक्षा अभियानों की स्थिति, शेष चुनौतियों और आगे की कार्ययोजना पर स्पष्ट दिशा तय की जाएगी।
‘फाइनल पुश’ के लिए रणनीतिक समीक्षा के लिए शाह का यह दौरा
हालिया कुछ सालों में अगर बस्तर में हुए बदलाव पर नजर डालें तो नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटी है। सुरक्षाबलों के कैंप अंदरूनी इलाकों तक पहुंचे हैं और नक्सलियों की भर्ती, फंडिंग और मूवमेंट कमजोर हुई है। पिछले 25 महीनों में माओवाद की टॉप लीडरशिप मुठभेड़ में मारी गई है और कुछ ने सरेंडर किया है।
ऐसे में ‘फाइनल पुश’ के लिए रणनीतिक समीक्षा जरूरी मानी जा रही है – और यही अमित शाह के दौरे का मूल उद्देश्य है।
अमित शाह अपने प्रवास के दौरान आईबी, सीआरपीएफ, बीएसएफ, राज्य पुलिस, डीआरजी और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें करेंगे।
इनमें मुख्य रूप से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि उनमें बस्तर के उन इलाकों का पता लगाया जाएगा कि कौन से इलाके अब भी ‘रेड जोन’ हैं? किस जिले में इंटेलिजेंस गैप है? किन इलाकों में ऑपरेशन तेज करने से सिविलियन रिस्क बढ़ेगा? विकास योजनाओं और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे रखा जाए?
अगर बात अमित शाह के बस्तर पंडुम में शामिल होने की करें तो भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्र कहते हैं कि इन तीन दिनों के दौरे में अमित शाह का बस्तर पंडुम में शामिल होना, सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और राजनीतिक संदेश है।
हालांकि बस्तर पंडुम को लेकर रणनीतिक और राजनीतिक संदेश के बीच कांग्रेस अध्यतक्ष दीपक बैज ने कहा कि बस्तर पंडुम आदिवासियों का त्यौहार है। सरकार के पास कोई काम नहीं है, इसलिए सरकार ने बस्तर पंडुम को हाईजैक कर लिया है। आदिवासियों की संस्कृति का सरकारीकरण कर लिया है।
सुरक्षा के साथ विकास मॉडल पर भी फोकस, लेकिन इसे लेकर सवाल भी
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान सुरक्षा के साथ अलग-अलग प्रोजेक्ट को लेकर कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं। हालांकि सरकारी अफसर इन प्रोजेक्ट्स को विकास का मॉडल बताने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे में 31 मार्च की डेडलाइन से पहले यह दौरा आने वाले दिनों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।
सड़क और संचार नेटवर्क का विस्तार, स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुंच, स्थानीय युवाओं को रोजगार और पुलिस बल में भर्ती, आदिवासी समाज की योजनाओं में भागीदारी जैसे विषयों पर बस्तर में विकास को लेकर चर्चा होगी, लेकिन इस दौरान चर्चा का फोकस उद्योग के लिए बस्तर का दरवाजा खोलना ही रहेगा। और इसे ही विकास का मॉडल बताने की कोशिश सरकारी स्तर पर की जा रही है।
इस पर दीपक बैज कहते हैं कि बस्तर में पिछले दो सालों में सरकार ने कोई विकास कार्य नहीं किए हैं। कई स्कूलों को बंद कर दिया गया, अस्पताल वेंटीलेटर पर हैं, विकास कार्य हो नहीं रहे हैं, सरकार के पास पैसा नहीं है। ऐसे में दीपक बैज यह सवाल उठाते हैं कि आगे सरकार ऐसे कौन से विकास कार्य करेगी, जो अब तक नहीं कर पा रही है?
बस्तर में भी ये आवाजें उठने लगीं हैं कि नक्सलवाद के खात्मे की आड़ में सरकार यहां के जंगलों को उद्योगपतियों के नाम करने की तैयारी कर रही है, जैसे हसदेव अरण्य सहित छत्तीसगढ़ के अन्य इलाकों और देश के कई राज्यों में हुआ है।
दीपक बैज ने फिर पूछे वही 9 सवाल
इसके अलावा अगर कांग्रेस अध्यसक्ष दीपक बैज के सवालों की बात करें तो उन्होंंने केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से उन्हीं 9 सवालों का जवाब मांगा है, जो उनसे पहले भी पूछे थे। इन सवालों के साथ दीपक बैज यह भी दावा कर रहे हैं कि उन 9 सवालों के जवाब तब अनुतरित थे इसलिए दोबारा वह सवाल पूछे जा रहे हैं।
पहला सवाल : बस्तर के विकास के लिए विशेष पैकेज कब देंगे?
दूसरा सवाल : शाह गारंटी देंगे बस्तरियों के मंशा के खिलाफ अदानी या अन्य उद्योगपतियों की बस्तर में एन्ट्री नहीं होगी?
तीसरा सवाल : एनएमडीसी का मुख्यालय बस्तर में क्यों नहीं आ रहा?
चौथा सवाल : नंदराज पहाड़ की लीज केन्द्र रद्द क्यों नहीं कर रहा?
पांचवां सवाल : नगरनार नहीं बिकेगा इसकी गारंटी देंगे?
छटवां सवाल : बस्तर की तीन खदानों बैलाडीला 1ए, 1बी, 1सी को मित्तल समूह और कांकेर की हाहालद्दी खदान रूंगटा समूह को क्यों बेचा गया? अमित शाह इसका जवाब देंगे?
सातवां सवाल : मोदी सरकार ने 2006 के वन अधिकार अधिनियम में संशोधन क्यों किया?
आठवां सवाल : आरक्षण विधेयक कब तक लंबित रहेगा?
नौवां सवाल : दल्लीराजहरा जगदलपुर रेल लाइन क्यों शुरू नहीं हो रही?
सुरक्षा अधिकारी भी मान रहे कि नक्सल नेतृत्व कमजोर, पर खतरा टला नहीं
इस दौरे के राजनीतिक संदेश से अलग अगर रणनीतिक मैसेज पर जाएं तो गृह मंत्री के दौरे को लेकर सुरक्षा से जुड़े अफसरों का मानना है कि अब नक्सलवाद रणनीतिक रूप से हाशिये पर है। नेतृत्व कमजोर हुआ है, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। अंतिम चरण सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में गृह मंत्री का मैदान में उतरकर समीक्षा करना यह संकेत देता है कि सरकार अंतिम चरण में कोई चूक नहीं चाहती।
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। ऐसे में वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह का यह दौरा सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा नीति के लिए भी टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।
असली परीक्षा मार्च के बाद प्रशासन और सरकार की निरंतरता होगी।
सुरक्षा अधिकारी भी यह मानते हैं कि अगर विकास और भरोसे की प्रक्रिया टूटी, तो खाली जगह फिर भरी जा सकती है।
अमित शाह का यह दौरा सुरक्षा बलों के लिए फाइनल निर्देश और प्रशासन के लिए अलर्ट है। यह दौरा बस्तर के लिए भविष्य की दिशा तय करॆगा।











