नई दिल्ली। केवल इसलिए कि कोई नागरिक केंद्र सरकार के कुछ फैसलों का विरोध कर रहा है और उसके खिलाफ नारे लगा रहा है, उसे किसी क्षेत्र से बाहर या जिला बदर नहीं किया जा सकता। यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने गुरुवार को दिया।
सिर्फ विरोध पर पांच साल का जिला बदरसिंगल जज जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी (49) के खिलाफ एक साल के लिए जिला बदर आदेश पारित किया था।
सईद केंद्र सरकार के विभिन्न फैसलों जैसे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे।जस्टिस जामदार ने याचिका पढ़ते हुए पूछा कि क्यों मात्र पांच FIR जिनमें ज्यादातर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के थे के आधार पर एक साल के लिए एक्सटर्नमेंट का आदेश दिया गया?
विरोध करने पर केस कैसे थोप सकते?
जस्टिस जामदार ने कहा, ‘यह क्या है? सभी नागरिकों को भारतीय सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है… वे प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते। यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हो रहे हैं। अगर लोग विरोध करें तो आप केस थोप देंगे। यह क्या है? नागरिकों का प्रदर्शन करना उनका अधिकार है। याचिकाकर्ता ने तो सिर्फ ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’, ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए। नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए एक्सटर्नमेंट आदेश क्यों?’
जस्टिस जामदार ने आगे मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पुलिस नागरिकों को सिर्फ इसलिए बाहर नहीं कर सकती क्योंकि उन्होंने सरकार के फैसलों का विरोध किया है। ‘पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक नहीं है, वे जनसेवक हैं। मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाऊंगा।’
हॉर्स ट्रेडिंग पर भी की टिप्पणी
जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ पर भी टिप्पणी की। हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ‘कल परसों एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में क्या चर्चा हो रही थी कि प्रेसिडिंग ऑफिसर कैसे चुना जाए और वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कैसे शिफ्ट हो गया।यह क्या है? आप (सईद) भी साइड बदल लीजिए… वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग चल रही है। आपके पास कुछ FIRs हैं।केस बदलने पर विचार करें, वॉशिंग मशीन है।’
कार्रवाई को बताया मौलिक अधिकार का उल्लंघन
आदेश में लिखित रूप से जस्टिस जामदार ने कहा, ‘याचिकाकर्ता ने अपनी क्षमता में सरकार ऑफ इंडिया के कुछ फैसलों के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित किए। यह महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को एक्सटर्न करने का आधार नहीं हो सकता। यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है। इसलिए याचिका का निपटारा जाइला बदर को रद्द करते हुए किया जाता है।’
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अनुसार नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है बल्कि गरिमा के साथ जीने का भी अधिकार है। याचिकाकर्ता के खिलाफ केवल सरकार के फैसलों का विरोध करने के लिए की गई कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
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