सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से उपजी आशंकाओं के बीच महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए आदेश दिया है कि मतदान से दो दिन पहले तक अपीलीय ट्रिब्यूनल से मंजूरी पाने वाले मतदाताओं को मतदान का अधिकार दिया जाएगा। यह वाकई लाखों मतदाताओं के लिए बहुत राहत की बात है।
एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य में करीब 90 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से कट गए थे, जिनमें ऐसे लोग भी थे जिनकी मृत्यु हो गई या जो दूसरी जगहों को चले गए। खुद सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि एसआईआर के कारण मतदाता सूची से वंचित हो चुके 34 लाख से अधिक लोग अपीली ट्रिब्यूनल में अपील कर चुके हैं। यह बड़ी संख्या है और इसने चुनाव आयोग की प्रक्रिया और उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर दिया था।
वास्तव में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच का यह आदेश चुनाव आयोग के कामकाज पर भी बड़ा सवालिया निशान है। भूलना नहीं चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले अधिकार के तहत उठाया। इस कदम के लिए संविधान निर्माताओं का भी शुक्रिया अदा किया जा सकता है, जिन्होंने संविधान में यह व्यवस्था की है कि यदि कोई संवैधानिक संस्था अपनी जवाबदेही से डिगती दिखे, तो उसे न्यायपालिका राह दिखा सके। और इससे भी बड़ी बात यह है कि इस आदेश से लाखों नागरिक अपने मताधिकार का उपयोग कर सकेंगे।
वास्तव में मुख्य चुनाव आयोग ज्ञानेश कुमार ने जिस तरह से एसआईआर को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था, उसने लाखों मतदाताओं के समक्ष संवैधानिक संकट पैदा कर दिया।
यह भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश से उपजी आशंकाओं को भी दूर किया है, जब उसने एसआईआर से वंचित हुए मतदाताओं से यह कहा था कि इस बार वोट न डाल सके, तो कोई बात नहीं अगली बार यह अधिकार मिल जाएगा। दरअसल यह जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी गई है कि वे साबित करें कि वे वैध मतदाता हैं। जिन लोगों के नाम एसआईआर में कट गए हैं, उनके पास अपीली ट्रिब्यूनल में अपील करने का मौका है और वहां से क्लिन चिट मिलने के बाद ही वे वोट डाल सकेंगे।
बेशक, चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार के बीच जिस तरह से एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर टकराव चल रहा था, उसके कारण भी अंतिम मतदाता सूची जारी करने में देरी हुई है, लेकिन इसका खामियाजा मतदाताओं को क्यों उठाना चाहिए?
सवाल तो यही है कि आखिर एक भी वैध मतदाता को उसे संविधान द्वारा मिले मताधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है।











