नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाए जाने के मामले में एक याचिका पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में उन लोगों की शिकायत थी, जिनमें चुनाव ड्यूटी पर तैनात करीब 65 अधिकारी भी शामिल हैं।
यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बीच आया है, जहां SIR प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में नाम हटाए गए थे। पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान हो चुका है, दूसरे चरण के लिए 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में याचिकाकर्ताओं को पहले अपीलीय मंच का इस्तेमाल करने की सलाह दे चुका है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले को सुना। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने तर्क दिया कि कई अधिकारियों के नाम बिना कोई ठोस वजह बताए मनमाने तरीके से सूची से हटा दिए गए।
उन्होंने कहा कि इन अधिकारियों के ड्यूटी आदेशों में उनके मतदाता पहचान पत्र (EPIC) नंबर साफ-साफ दर्ज हैं, लेकिन अब वे नंबर ही सूची से गायब कर दिए गए हैं। इससे चुनाव कराने वाले लोग खुद वोट नहीं डाल पा रहे हैं, जो प्रथम दृष्टया मनमाना रवैया लगता है। कई मामलों में तो हटाने का कोई कारण भी नहीं बताया गया।
पीठ ने याचिकाकर्ताओं को तत्काल राहत देने से मना कर दिया और उन्हें अपीलीय न्यायाधिकरणों का रुख करने की सलाह दी। ये न्यायाधिकरण शीर्ष अदालत के ही आदेश पर इस तरह की शिकायतों के लिए बनाए गए हैं। CJI सूर्यकांत ने कहा, “अपनी दलीलें अपीलीय न्यायाधिकरण के सामने रखें। उन्हें इसकी जांच करने दें।”
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने माना कि जिनकी अपीलें अभी लंबित हैं, वे शायद इस बार के विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदाता सूची में नाम बहाल करने का अधिकार ज्यादा मूल्यवान है। उन्होंने कहा, “इस चुनाव में वे वोट न दे सकें, यह हो सकता है। लेकिन सूची में बने रहने का अधिकार हर हाल में सुरक्षित रहेगा। न्यायाधिकरण उचित आदेश पारित करेंगे।”
कोर्ट ने अपीलीय न्यायाधिकरणों को निर्देश दिया कि वे जरूरी मामलों में याचिकाओं की सुनवाई प्राथमिकता से करें, खासकर उन लोगों की जिन्होंने तात्कालिकता साबित की हो।









