देश के 75 बरस के संसदीय इतिहास की यह अभूतपूर्व घटना है, जब पश्चिम बंगाल में 27 लाख वोटरों के नाम विवादों से घिरे मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत काट दिए गए हैं और वे इसी महीने वाले विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल सकेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ाई के बाद छह और सात अप्रैल की मध्य रात्रि को यह जानकारी देते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीआई) मनोज कुमार ने जो कहा, उस पर गौर करना चाहिएः ‘न्यायिक अधिकारियों द्वारा जिन मतदाताओं के हटाए गए हैं, वे अपीली ट्रिब्यूनल से संपर्क कर सकते हैं। यदि ट्रिब्यूनल उनके नामों की मंजूरी देता है, तो उनके नामों को मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा, लेकिन वे बाद में वोट डाल सकेंगे, इस चुनाव में नहीं।‘
यह सचमुच अजीब स्थिति है और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी क्षमता यहां तक कि उसकी नीयत पर भी सवाल उठाती है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने बहुत क्षोभ के साथ कहा है कि पिछले 75 बरस में ऐसा कभी नहीं हुआ।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाईआर कुरैशी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि चूंकि इन मतदाताओं की प्रामाणिकता की जांच पूरी नहीं हुई है, इसलिए उन्हें वोट देने की इजाजत देनी चाहिए।
वास्तव में पश्चिम बंगाल में एसआईआर की पूरी प्रक्रिया ही विवादों और राज्य की ममता बनर्जी सरकार तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के टकराव के बीच चली है। वहां पहले ही मृत्यु या दोहराव के कारण 58.2 लाख के करीब वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जिसे लेकर तो कोई विवाद हो ही नहीं सकता। जाहिर है, जो इस दुनिया में है ही नहीं, वह वोट डालने नहीं आएगा। मगर जो जिंदा लोग हैं और इसी देश के नागरिक हैं, उनके वोट काटे जाएं, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
दरअसल पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद जो तस्वीर उभरी है, वह बेहद चिंताजनक इसलिए भी है, क्योंकि जिन 27 लाख लोगों के नाम काटे गए हैं, उनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता हैं। इसका सर्वाधिक असर मालदा, मुर्शिदाबाद और नंदीग्राम जैसे क्षेत्रों पर पड़ा है और इस प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी ठोस वजहें भी जमीन पर हैं। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपसीआर) ने दस्तावेजों के साथ दावा किया है कि अनेक लोगों के पूरे परिवार के नाम वैध दस्तावेजों के बावजूद काट दिए गए!
यह पूरी प्रक्रिया किस मनमाने ढंग से चली है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि देश के संविधान में रेखांकन करने वाले महान कलाकार और देशभक्त नंदलाल बोस के नाती 88 बरस के सुप्रबुद्द्ध सेन और उनकी पत्नी दीपा तक के नाम एसआईआर के जरिये हटा दिए गए हैं, जबकि वे दशकों से शांति निकेतन क्षेत्र के मतदाता रहे हैं!
ऐसा लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआईआर को खुद की प्रतिष्ठा और अहंकार से जोड़ लिया है, जबकि यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि एक भी मतदाता मताधिकार से वंचित न हो। वह लोकतंत्र का एक पुर्जा भर हैं, वह लोकतंत्र से बड़े नहीं हो सकते।











