सालभर से जारी राष्ट्रपति शासन को खत्म कर मणिपुर में भाजपा नेता युमनाम खेमचंद सिंह की अगुआई में नई सरकार के गठन के तुरंत बाद भड़की हिंसा दिखा रही है कि राज्य में मैतेई और कुकी-जो समुदाय के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी है और वहां हालात अब भी कितने नाजुक हैं।
केंद्र की मोदी सरकार के मैतेई मुख्यमंत्री के मातहत एक कुकी और एक नगा उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के फॉर्मूले की तभी हवा निकल गई, जब कुकी उपमुख्यमंत्री नेमचा किपजेन ने मणिपुर के राजभवन में नहीं, बल्कि नई दिल्ली में मणिपुर भवन में वर्चुअल माध्यम के जरिये शपथ ली!
पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले और उन्हीं के मैतेई समुदाय के युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया है। उनके साथ कुकी समुदाय की नेमचा किपजेन और नगा पीपुल्स फ्रंट के लोसी दिखो को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। यह जातीय समुदायों में संतुलन साधने की कोशिश जरूर दिखती है, लेकिन ऐसा लगता है कि ऐसा जमीनी तैयारी के बिना किया गया है।
बेशक, मणिपुर के लोग लंबे समय से एक चुनी हुई सरकार के हकदार थे और इस लिहाज से यह एक जरूरी कदम था। मगर मई, 2023 में मणिपुर में भड़की हिंसा के बाद के घटनाक्रम को देखें तो केंद्र सरकार का रवैया बेहद मायूस करने वाला रहा है।
मई, 2023 में मणिपुर में मैतेई समुदाय को एक कोर्ट के आदेश पर अनूसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने से कुकी जनजातीय लोग नाराज हो गए थे और उसके बाद भड़की हिंसा ने इस राज्य को अंधी सुरंग की ओर धकेल दिया था। बढ़ती अराजकता के बीच नाकारा साबित होने के बावजूद किस तरह से वहां तत्कालीन मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर मोदी सरकार का भरोसा बना रहा, यह सारे देश ने देखा।
मोदी सरकार ने 9 फरवरी, 2025 को बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद वहां राष्ट्रपति शासन लागू तो कर दिया, लेकिन विधानसभा को भंग न कर निलंबित अवस्था में रखा गया था। वास्तव में उस सरकार ने लोगों का पूरा भरोसा खो दिया था और वहां विधानसभा को भंग कर अनुकूल समय में जनादेश लेने की जरूरत थी। इसके उलट साफ देखा जा सकता है कि मोदी सरकार वहां मौका देखकर एनडीए की सरकार बनवाना चाहती थी।
एकबारगी देखा जाए, तो इसमें कोई वैधानिक बाधा नहीं थी, लेकिन यह सब कितना अदूरदर्शिता के साथ हुआ है, इसका असर देखा जा सकता है कि विधानसभा की कार्यवाही में उपमुख्मंत्री नेमचा किपजेन के साथ ही दो अन्य विधायक सशरीर न उपस्थित होकर वर्चुअली हिस्सा ले रहे हैं!
वहां के हालात को समझने के लिए जनजातियों में बंटे मणिपुर की जमीनी स्थिति को भी समझना जरूरी है। जैसे कुकी समुदाय के अंतर्गत आने वाले थाडी किपजेन से खुश हैं, क्योंकि वे भी थाडी हैं। थाडी इनपी मणिपुर ने तो उनके उपमुख्यमंत्री बनने को ऐतिहासिक क्षण बनाया है।
दूसरी ओर वृहत कुकी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले ज्वाइंट फोरम ऑफ सेवन और कुकी स्टुडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (केएसओ) सहित अन्य कुकी संगठन लंबे समय से कुकी बहुल इलाकों को केंद्र शासित क्षेत्र बनाने या उनके लिए अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की मांग कर रहे हैं, और इसे लेकर वे बेहद आक्रामक हैं।
अच्छा तो यही हुआ होता कि मोदी सरकार संसद का कोई सर्वदलीय दल और साथ में मणिपुर के जानकारों का कोई दल वहां भेजकर जमीनी स्थिति को समझती और कोई कदम उठाती। नई सरकार के गठन के बावजूद वहां विभिन्न समुदायों के बीच भरोसे का जो संकट है, उसे दूर करने की जरूरत है।
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