डोनाल्ड ट्रंप की मोहलत का मतलब

March 23, 2026 9:17 PM
us iran war

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से ईरान के खिलाफ पांच दिन के संघर्ष विराम का ऐलान किया है, उसके पीछे समझदारी से कहीं अधिक उनकी मजबूरी साफ देखी जा सकती है। इसके बावजूद यह कदम फौरी तौर पर सारी दुनिया के लिए राहत देने वाला है, क्योंकि ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे रखा था और कहा था कि यदि उसने ऐसा नहीं किया, तो अमेरिका ईरान के पावर संयंत्रों को ध्वस्त कर देगा। बदले में ईरान ने भी धमकी दी कि यदि उसने ऐसा किया, तो वह खाड़ी क्षेत्र के उन संयंत्रों को निशाना बनाएगा जहां से अमेरिकी ठिकानों को बिजली दी जा रही है।

इस्राइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर 28 फरवरी को थोपा गया यह युद्ध वैसे भी रणक्षेत्र के बजाए अब तेल ठिकानों और ऊर्जा संयंत्रों तक पहुंच चुका है और उसका असर भारत सहित तमाम देशों में देखा जा सकता है।

ट्रंप का दावा है कि ईरान के साथ पिछले दो दिनों के दौरान हो रही बातचीत के सकारात्मक नजीते निकले हैं और अगले पांच दिन तक ईरान के पावर संयंत्रों पर हमला न करने का फैसला उसी से निकला है। दूसरी ओर जिस तरह से ईरान के विदेश मंत्रालय और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉप (आईआरजीसी) के हवालों से आई अलग-अलग खबरों में दावा किया गया है कि ट्रंप प्रशासन से उनकी कोई बात ही नहीं चल रही है और यह फैसला ट्रंप ने उनके दबाव में लिया है, तो समझा जा सकता है कि इस जबरिया जंग में डोनाल्ड ट्रंप खुद किस तरह घिर चुके हैं।

गौर किया जाना चाहिए कि ट्रंप के ऐलान के बावजूद इस्राएल ने ईरान पर हमले नहीं रोके।

ईरान से दो तरह के दावे सामने आए हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने यह कदम तेल के दाम गिराने के लिए उठाया है। काफी हद तक यह सही लगता है, क्योंकि ट्रंप के ऐलान के तुरंत बाद कच्चे तेल के दाम 13 फीसदी गिर कर 96 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं। वहीं आईआरजीसी का दावा है कि ईरान ने चूंकि खाड़ी देशों में अमेरिकी अड्डों को बिजली देने वाले ठिकानों पर हमले का एलान किया इसलिए ट्रंप ने कदम खींचे।

दरअसल अमेरिका और इस्राइल के निशाने पर ईरान के जो संयंत्र हैं वे इस्फहान और नतांज में हैं और उसे शक है कि यहां यूरेनियम का बड़ा भंडार है। ईरान शुरू से दावा करता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण और उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है।

याद किया जा सकता है कि यह डोनाल्ड ट्रंप ही थे, जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में 2017 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के लिए सुरक्षा परिषद के पांच देशों और जर्मनी के साथ चल रही वार्ता से अलग कर लिया था। यह बात पहले दिन से ही साबित हो चुकी है कि ईरान पर यह युद्ध जबरिया थोपा गया है और सारी दुनिया को ऐसे संकट में डाल दिया गया है, जिससे उबरने में वक्त लगेगा।

अच्छा तो यह होगा कि इन पांच दिनों में टिकाऊ सुलह का रास्ता तलाशा जाए। सवाल यही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस मौके को चाहे इसके पीछे ट्रंप की कोई चाल ही क्यों न हो, शांति के लिए इस्तेमाल करेगी?

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