वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का नौवां भाषण उनके पिछले कई मैराथन भाषणों से अपेक्षाकृत छोटा था और काफी हद तक थका हुआ भी। आर्थिक सर्वेक्षण में जिन चुनौतियों का जिक्र किया गया था, उनसे मुकाबले की कोई साफ रणनीति तो बजट में दिखाई नहीं ही दी, इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी नीतियों और दबावों से उपजी पऱिस्थितियों से निपटने की दूरदृष्टि का भी अभाव दिखा है।
भारत की अर्थव्यवस्था को अमूमन कल्याणकारी माना जाता है, लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसमें लगातार विचलन आता जा रहा है और निजी क्षेत्र खासतौर से कॉर्पोरेट को बढ़ावा दिया जा रहा है। मोदी सरकार का ताजा बजट भी इससे अछूता नहीं है।
खासतौर से सार्वजनिक उपक्रमों की खस्ताहालत और बैंकिंग तथा बीमा क्षेत्र का बढ़ता निजीकरण इसी का नतीजा हैं। इस बजट में भी वित्त मंत्री ने संकेत दे ही दिए हैं कि आने वाले समय में बैंकिंग रिफॉर्म किया जाएगा। अभी साफ नहीं है कि इस सुधार का आखिर मतलब क्या सरकार के अपनी जिम्मेदारी छोड़कर निजी क्षेत्र के हवाले करने से तो नहीं है।
हाल ही में मोदी सरकार ने रिफॉर्म यानी सुधार के नाम पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर उसकी जगह विकसित भारत जी राम जी यानी वीबी जी राम योजना की शुरुआत की है। जबकि इसमें मनरेगा के उस संवैधानिक प्रावधान को ही कमजोर कर दिया गया है, जिसमें मांग पर काम दिए जाने का प्रावधान था। इस योजना के लिए वित्त मंत्री ने 95692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जुड़े कार्यक्रम को खत्म किए जाने के भारी विरोध के कारण ही लगता है कि वित्त मंत्री ने खादी, हैंडलूम और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना का एलान किया है, लेकिन खादी ग्रामोद्योग का पहले ही जिस तरह का कबाड़ा कर उसे क़ॉर्पोरेट रूप देने की कोशिश की गई है, वह गांधी की सादगी से कहीं भी मेल नहीं खाती।यही नहीं, मोदी सरकार ने खादी पर से जीएसटी हटाने की मांग को नजरंदाज ही कर दिया है।
इसी तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का ऐलान किया था, लेकिन अब तो सालाना बजट में इस पर कोई चर्चा तक नहीं होती। सीतारमण ने किसानों की आय बढ़ाने की बात तो की है, लेकिन सीधे खेती के बजाए उन्होंने पशुपालन, डेयरी, और मछलीपालन जैसे खेती से जुड़े उद्यमों का जिक्र किया। जबकि आर्थिक सर्वेक्षण में बीते एक दशक के दौरान पशुपालन और मछलीपालन की तुलना में फसल क्षेत्र की वृद्धि 3.5 फीसदी के रूप में आधी ही रही।
सामाजिक क्षेत्रों के जानकारों के साथ ही अनेक अर्थशास्त्री स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बजट को जीडीपी का क्रमशः 1.5 फीसदी से बढ़ाकर 2.5 फीसदी और चार फीसदी से बढ़ाकर छह फीसदी करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इसे इस बार भी नजरंदाज कर दिया गया।
दूसरी ओर हैरत नहीं कि रक्षा बजट में 15 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई है और अब यह 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
बेशक सरकार को देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहिए, लेकिन इसकी आड़ में दूसरी प्राथमिकताएं नहीं छोड़ी जा सकतीं। आखिर दशक भर पहले सरकार ने जो हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था, उसका क्या हुआ? वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में हमारे विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षण संस्थान अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में फिसड्डी क्यों साबित हो जाते हैं? हमारे संस्थान नवोन्मेष में क्यों पिछड़ जाते हैं? अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार भारत में बढ़ती असमानता को लेकर आगाह कर रही हैं, उसे दूर करने के उपाय कहां हैं?
गजब यह है कि वित्त मंत्री ने रील बनाने के लिए स्कूलों में कंटेंट क्रिएशन लैब स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है! बेशक भारी-भरकम आधारभूत संरचनाओं से विकास का पहिया चलता है। पर महानगरों या बड़े शहरों को जोड़ने वाले हाई स्पीड रेल कॉरीडोर या हाईवे के साथ ही ग्रामीण भारत और छोटे कस्बों को जोड़ने वाली सड़कों और रेल गाड़ियों की कहीं अधिक जरूरत है।
मुश्किल यह है कि जबसे मोदी सरकार ने रेल बजट को आम बजट का हिस्सा बना दिया है, इस सबसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम के बारे में, जिसे देश की जीवन रेखा कहा जाता है और जिस पर रोजाना चार करोड़ लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है, आम बजट से कुछ खास पता नहीं चलता है।
आर्थिक सर्वेक्षण में खासतौर से महिलाओं को नकद हस्तांतरण जैसी योजना को लेकर सवाल उठाए गए हैं, उसे लेकर कोई जवाब बजट से नहीं मिलता है। बेशक वित्त मंत्री वित्तीय घाटे को जीडीपी के 4.3 फीसदी के लक्ष्य तक ले आई हैं, लेकिन उनकी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं, चाहे तो वे इन चुनौतियों को अपना कर्तव्य भी कह सकती हैं।










