बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई शिखर बैठक से साफ है कि ईरान पर थोपा गया युद्ध अब अमेरिका के लिए भारी पड़ रहा है और वह वहां से निकलना चाहता है।
अव्वल तो यह समझने की जरूरत है कि करीब दशक भर बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का यह चीन का पहला दौरा है। दोनों देशों के रिश्ते बीते डेढ़ दो बरसों में न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए थे। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा थोपे गए टैरिफ ने दोनों देशों को टकराव की स्थिति में ला दिया था। ईरान पर इस्राइल और अमेरिका के हमले के बाद दोनों देशों के बीच तल्खी और बढ़ गई।
ऐसे में दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों के नेताओं की इस मुलाकात के खास मायने तो हैं ही। खुद ट्रंप अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों के साथ वहां आए थे। यह धंधे का मामला है और जरूरत दोनों को एक दूसरे की है। असल में ईरान युद्ध ने डोनाल्ड ट्रंप को परेशान कर दिया है, भले ही वे बढ़ा-चढ़ा कर दावे क्यों न करें। अमेरिका अब ईरान से निकलना चाहता है।
मजेदार यह है कि 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमले के बाद से डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से हमलावर थे और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग परिदृश्य से लगभग गायब थे, तब लग रहा था कि चीन वैश्विक परिदृश्य में कहीं कमजोर तो नहीं पड़ रहा है।
लेकिन युद्ध के बढ़ने के साथ-साथ यह साफ होता गया है कि इससे यदि किसी बड़ी अर्थव्यवस्था पर कम असर पड़ रहा है, तो वह चीन है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि चीन ईरान का सबसे भरोसेमंद दोस्त है। वह अपना अधिकांश तेल पश्चिम एशिया से खरीदता है और ईरान का वह सबसे बड़ा खरीदार है। यही नहीं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से उसके तेल टेंकरों की आवाजाही पर बहुत फर्क नहीं पड़ा है। यहां तक कि बुधवार को जब डोनाल्ड्र ट्रंप बीजिंग पहुंचे उस दिन ईरान ने 20 लाख बैरल तेल से लदे चीनी टैंक को होर्मुज से निकलने की मंजूरी दी, जबकि यह टैंकर खाड़ी में मार्च से खड़ा था!
ऐसे में दोनों नेताओं ने यदि इस बात पर सहमति जताई है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ऊर्जा की मुक्त आवाजाही के लिए खुला रखा जाना चाहिए, तो इसे युद्ध के जल्द खत्म होने का संकेत माना जा सकता है। चीन ने होर्मुज के सैन्यीकरण और वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाए जाने का भी विरोध किया है। इसके साथ ही दोनों देशों ने सहमति जताई है कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होना चाहिए।
हालांकि युद्ध खत्म की उम्मीदें इस बात पर भी टिकी हैं कि जिनपिंग और ट्रंप अपने वादों पर कितना खरे उतरते हैं। एक बात तो तय है कि इसे खत्म करने में जिनपिंग सबसे अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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