उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए जारी की गई विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नई समता (इक्विटी) नियमावली पर सवर्ण समुदाय और सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर उठे भारी विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, लेकिन इसने समाज में व्याप्त जातिगत दरारों को और उभार कर सामने रख दिया है।
भारतीय समाज की जातिगत असमानता और विसंगतियों को समझना कोई राकेट साइंस नहीं है। यह तो यूजीसी के नए नियमों के जारी होते ही खासतौर से हिंदी पट्टी में हुए विरोध प्रदर्शन के तरीकों से समझा जा सकता है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को हिंदुओं का सबसे बड़ा पैरोकार बताने वाले भी गालियां देते नजर आए हैं।
हैरत नहीं कि इन नियमों का विरोध करने वालों में साधु-संत और अपने विवादास्पद और भड़काऊ बयानों के लिए जाने जाने वाले धीरेंद्र शास्त्री जैसे लोग भी थे। इन लोगों ने इन नियमों को हिंदुओं को बांटने वाला बताया था, और इसी से इनके विरोध के पीछे की राजनीति को समझा जा सकता है।
समता नियमावली में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के साथ होने वाले भेदभाव को परिभाषित किया गया है और संस्थानों पर कानूनी दायित्व डाला गया है कि वे इन तबकों के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को उत्पीड़न और भेदभाव से बचाव सुनिश्चित करें। यही नहीं, संबंधित संस्थानों पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है, जिसने सवर्ण तबके को बेचैन कर दिया है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न की तस्वीर तो यूजीसी द्वारा शिक्षा से संबंधित संसद की स्थायी समिति को दिए गए डाटा से ही साफ हो जाती है, जिसके मुताबिक उच्च शिक्षा से संबंधित परिसरों में जातिगत भेदभाव से संबंधित शिकायतें 2019-20 में 173 से करीब तीन गुना बढ़ कर 2023-24 में 378 हो गईं।
इसी जातिगत भेदभाव के कारण रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी जैसी प्रतिभाओं की जान चली गई थी। रोहित की मां एक दशक से अपने बेटे को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं और यह बताने की जरूरत नहीं है कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने बेपरवाही से उनकी मौत के पीछे जातिगत उत्पीड़न से ही इनकार कर दिया था!
2012 के नियमों की जगह लेने वाले यूजीसी के नए नियमों के बारे में मौजूदा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि इनके दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी। मगर यह साफ दिखता है कि उनकी अपनी सरकार ने इन नियमों का सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से बचाव नहीं किया।
इन नियमों पर रोक लगाते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नियम पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया। यही नहीं, जस्टिस सूर्यकांत ने तो यहां तक कहा, “हमने जातिविहीन समाज की दिशा में जो भी प्रगति की है, क्या अब हम फिर से पीछे की ओर जा रहे हैं।“
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार को अंदेशा नहीं था कि इन नियमों का अदालत में क्या हस्र हो सकता है? आखिर वह देश की सर्वोच्च अदालत को आश्वस्त क्यों नहीं कर पाई कि ये नियम उच्च शिक्षण संस्थाओं में जातिगत भेदभाव को दूर करने और समता स्थापित करने में कारगर होंगे? आखिर वह यह क्यों सुनिश्चित नहीं कर पाई कि इन नियमों का किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं होगा?
दरअसल साढ़े तीन दशक पहले वी पी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया था, तब भी उसका सवर्ण तबकों के द्वारा हिंसक विरोध किया गया था। सड़कों पर आगजनी की गई थी और आत्मदाह के प्रयास तक किए गए थे।
बेशक इसकी कीमत वीपी सिंह ने अपनी सरकार गंवा कर चुकाई थी, लेकिन मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने के बाद अन्यथा हाशिये पर रहने वाली अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की अनेक जातियों के लोगों को देश की मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर मिले।
सवाल है कि क्या मोदी सरकार ने यूजीसी के नए नियमों के जरिये शांत जल में कंकड़ फेंक कर हलचल जानने की कोशिश की है? इस मामले में 19 मार्च को अगली सुनवाई है, और तब देखना होगा कि सरकार अपना बचाव कैसे करती है। कहने की जरूरत नहीं कि यह मामला इतनी जल्द खत्म नहीं होने वाला है।










