देश भर के कर्मचारी संगठन भारत सरकार के नए लेबर कोड्स के खिलाफ लामबंदहैं। ये चार नए लेबर कोड्स कोड ऑन वेजेस 2019, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड 2020, कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020, और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020 ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समाहित कर लिया है। सरकार ने इन्हें ‘आधुनिकीकरण’, ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘सिंप्लिफिकेशन’ के रूप में पेश किया है, लेकिन ट्रेड यूनियंस इन्हें श्रमिकों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला मानती हैं। ये कोड्स नवंबर 2025 में लागू हुए, और फरवरी 2026 तक विरोध चरम पर पहुंच गया।
ट्रेड यूनियंस और श्रम विशेषज्ञों का प्रमुख आरोप है कि ये इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ ) के कई महत्वपूर्ण कन्वेंशंस का उल्लंघन करते हैं। भारत आईएलओ का संस्थापक सदस्य है और कई कन्वेंशंस को रैटिफाई किया है, लेकिन नए कोड्स में प्रक्रियागत और सामग्री दोनों स्तर पर कमियां बताई जाती हैं। सीटू, एटक और इंटक जैसे ट्रेड यूनियंस ने इन कोड्स को श्रमिक विरोधी बताते हुए आईएलओ से शिकायत भी की है।
ट्रेड यूनियंस का मुख्य आरोप है कि ये कोड्स श्रमिकों के हितों की बजाय नियोक्ताओं के पक्ष में भारी झुकाव रखते हैं। दशकों से संघर्ष से हासिल सुरक्षा, सामूहिक सौदेबाजी (कलेक्टिव बार्गेनिंग), नौकरी की स्थिरता और हड़ताल का अधिकार कमजोर हो रहे हैं। यूनियंस का कहना है कि ये सुधार नहीं, बल्कि हायर एंड फायर को कानूनी मान्यता देने और असुरक्षित रोजगार को बढ़ावा देने की साजिश हैं।
पुराने कानूनों में 100 कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में छंटनी, लेऑफ या बंद करने के लिए सरकार की अनुमति जरूरी थी। नए कोड्स में यह सीमा बढ़ाकर 300 कर दी गई है। इससे 90% से ज्यादा फैक्ट्रियां और प्रतिष्ठान इस दायरे से बाहर हो जाते हैं, जिससे नियोक्ता बिना अनुमति के आसानी से कर्मचारियों को निकाल सकते हैं।
कोड्स में फिक्स्ड टर्म कोड को सभी क्षेत्रों में वैध बनाया गया है। नियोक्ता अब किसी भी काम (यहां तक कि स्थायी प्रकृति के) के लिए 6-11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर कर्मचारी रख सकते हैं। कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर कोई नोटिस या कंपेंसेशन नहीं। यूनियंस इसे कानूनी हायर एंड फायर कहती हैं, क्योंकि इससे स्थायी नौकरियां कम होंगी और असुरक्षा बढ़ेगी। फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारियों के बराबर वेतन और लाभ मिलने का प्रावधान है, लेकिन यूनियंस कहती हैं कि यह सिर्फ कागजी है। व्यवहार में नवीनीकरण नहीं होता।
इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड में हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस अनिवार्य है (पहले सिर्फ सरकारी क्षेत्र में था)। इससे फ्लैश स्ट्राइक्स रुक जाएंगी और सामूहिक सौदेबाजी कमजोर होगी। यूनियंस इसे वर्चुअल स्लेवरी कहती हैं।
सोल नेगोशिएटिंग यूनियन की अवधारणा से एक ही यूनियन को नेगोशिएशन का अधिकार मिलेगा, जिससे बहुलता खत्म हो सकती है। यूनियन रजिस्ट्रेशन कठिन और इंस्पेक्शन सिस्टम कमजोर है।
कोड्स में गिग वर्कर्स और अन ऑर्गनाइज्ड सेक्टर को कवर करने का दावा है, लेकिन यूनियंस कहती हैं कि असल में वेलफेयर स्कीम्स कमजोर हैं। न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम, सेफ्टी नॉर्म्स में छूट। प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा, क्योंकि पब्लिक सेक्टर में सुरक्षा कम होने से एसेट्स बेचना आसान हो जायेगा।
ये प्रावधान आईएलओ कन्वेंशंस (जैसे फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन, कलेक्टिव बार्गेनिंग) का उल्लंघन करते हैं। यूनियंस का कहना है कि ये कोड्स बिना ट्राइपार्टाइट कंसल्टेशन (सरकार-यूनियन-एम्प्लॉयर्स) के पास हुए, जो संवैधानिक भावना के खिलाफ है।
10 सेंट्रल ट्रेड यूनियंस और संयुक्त किसान मोर्चा ने 12 फरवरी 2026 को राष्ट्रव्यापी जनरल स्ट्राइक भारत बंद का आह्वान किया था जिसमें मुख्य मांग थी कि सरकार चारों लेबर कोड्स वापस लें, प्राइवेटाइजेशन रोकें, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स रद्द करें, मनरेगा जैसे कानूनों में बदलाव न करें।
यूनियंस के दावे के अनुसार, 30 करोड़ से ज्यादा मजदूर, किसान और कर्मचारी शामिल हुए। 600 जिलों में प्रभाव दिखा। बैंक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, फैक्टरियां, कोयला खदानें, रेलवे, पावर सेक्टर में आंशिक/पूर्ण बंद। महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल में बड़े प्रदर्शन किये गये और दिल्ली में रैलियां, मुंबई में मार्च किये गये।
नये लेबर कोड में इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर सिस्टम से पेनल्टी कम, कंप्लायंस गाइडेंस पर फोकस ज्यादा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इससे नियोक्ताओं को छूट मिलेगी। नेशनल फ्लोर वेज अच्छा है लेकिन न्यूनतम वेतन निर्धारण में कमी रह गई है। । फिक्स्ड टर्म पर ग्रेच्युटी 1 साल बाद, लेकिन कुल मिलाकर असुरक्षा बढ़ती है।
नए लेबर कोड्स सरकार की बिजनेस फ्रेंडली नीति का हिस्सा हैं, लेकिन ट्रेड यूनियंस इन्हें श्रमिक विरोधी मानती हैं। ये नौकरी की स्थिरता, सामूहिक शक्ति और सामाजिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं, जिससे असमानता बढ़ेगी।
चारों लेबर कोड्स को संसद में बिना पर्याप्त बहस, ट्रेड यूनियंस से सार्थक परामर्श या भारतीय लेबर कॉन्फ्रेंस में चर्चा के पास किया गया। 2019-2020 में पास होने के बाद 21 नवंबर 2025 को नोटिफाई किया गया, लेकिन ट्रेड यूनियंस का कहना है कि कोई ट्राइपार्टाइट डिस्कशन नहीं हुआ। आईएलओ ने 2020 में राज्य स्तर पर लेबर लॉ सस्पेंड होने पर डीप कंसर्न जताया था और प्रधानमंत्री से अपील की थी कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन करें।
इसी तरह कोड्स पर भी ट्रेड यूनियंस ने आईएलओ को लिखा कि यह कन्वेंशन 144 का उल्लंघन है। यह कन्वेंशन सरकार, नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों के बीच त्रिपक्षीय परामर्श अनिवार्य करता है, खासकर अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों को लागू करने या नए कानून बनाने के समय।
कर्मचारी यूनियन का कहना है कि हड़ताल के लिए सभी इंडस्ट्रियल एस्टेब्लिशमेंट्स में 14 दिन का अनिवार्य नोटिस अनिवार्य कर दिया गया है। जो पहले सिर्फ पब्लिक यूटिलिटी में था। इससे स्पॉन्टेनियस या फ्लैश स्ट्राइक्स असंभव हो जाती हैं। सोल नेगोशिएटिंग यूनियन की अवधारणा से एक ही यूनियन को नेगोशिएशन का अधिकार दिया गया है, जिससे यूनियंस की बहुलता और स्वतंत्रता कमजोर होती है। यूनियन रजिस्ट्रेशन कठिन हो जायेगा और हड़ताल को गैर कानूनी घोषित करने की शक्ति सरकार के पास रहेगी।
ट्रेड यूनियंस इसे वर्चुअल स्लेवरी कहती हैं, क्योंकि कलेक्टिव बार्गेनिंग पावर खत्म हो जाती है। फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट से कर्मचारियों में नवीनीकरण की चिंता रहती है, जो यूनियन एक्टिविटी को डराती है।
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