नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक संगीतकार टीएम कृष्णा की उस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगाऔर गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को चुनौती दी गई है, जिनमें आधिकारिक कार्यक्रमों में गीत के पूरे छह पद गाने का प्रावधान है।मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका की सुनवाई की।
अदालत तय नहीं करेगी राष्ट्रगीत क्या
पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि यह तय करना अदालत के कार्यक्षेत्र में नहीं है कि “राष्ट्रीय गीत” क्या है? लेकिन वह यह जांचेगी कि ‘बिजो इमैनुएल’ मामले में मान्यता प्राप्त अंतःकरण से आपत्ति करने वाले व्यक्ति के न गाने के अधिकार की रक्षा होती है या नहीं? पीठ ने कहा कि वह अपेक्षा करती है कि ‘बिजो इमैनुएल’ का नजीर लागू होगा और धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति पर दंड नहीं लगेगा।
चुनौती का केंद्र
चुनौती वंदे मातरम के छह पदों में से अंतिम चार पदों पर केंद्रित है। कृष्णा का तर्क है कि इन पदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं का स्पष्ट उल्लेख है और उन्हें गाने के लिए बाध्य करना धार्मिक तथा वैचारिक स्वीकृति थोपना है, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विरुद्ध है।
क्या क्या दी गई दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में “राष्ट्रीय गीत” को परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे दुरुपयोग हो सकता है। गृह मंत्रालय का कार्यालय ज्ञापन राजपत्रित भी नहीं है।न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रगान में “इन गॉड वी ट्रस्ट” शब्द हैं, जबकि अमेरिका सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण माना जाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि “धर्मनिरपेक्षता इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती”।
मुरलीधर ने दोहराया कि संशोधन में राष्ट्रीय गीत परिभाषित नहीं है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि प्रथा के अनुसार इसे “वंदे मातरम” समझा जाता रहा है। मुरलीधर ने तुरंत कहा “दो पदों के साथ”। उन्होंने कहा कि सरकार ने कार्यालय ज्ञापन से अचानक समझ बदल दी और संशोधन बिना राष्ट्रीय सहमति के जल्दबाजी में पारित हुआ।
आपराधिकरण की चुनौती
याचिका अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। 2026 के संशोधन ने धारा 3 को बदलकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत गाने से जानबूझकर रोकने या गाने वाले जमावड़े में बाधा डालने पर तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया है।कृष्णा का तर्क है कि गृह मंत्रालय के आदेशों के साथ यह प्रावधान छह पदों वाले संस्करण को अनिवार्य बना देता है। बाधा शब्द अस्पष्ट और व्यापक है, जिससे आलोचना, कलात्मक अभिव्यक्ति और शिक्षण पर ठंडा प्रभाव पड़ सकता है।
बिजो इमैनुएल पर निर्भरता
याचिका 1986 के ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ फैसले पर जोर देती है, जिसमें राष्ट्रगान न गाने वाले छात्रों के अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा की गई थी। अनुच्छेद अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
पहले मामला कर दिया था खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 में मुहम्मद सईद नूरी मामले में जनवरी 2026 के आदेश को इसलिए खारिज किया था क्योंकि तब न गाने पर दंड नहीं था। अब संशोधन के बाद स्थिति बदल गई है।याचिका में संशोधित धारा 3 और गृह मंत्रालय के आदेशों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन घोषित करने, केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत मानने और अंतरिम सुरक्षा की मांग की गई है।









