‘सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं’ ये कहते हुये सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

March 24, 2026 3:14 PM

Supreme Court order: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) पर कार्यरत महिला अधिकारियों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए उन्हें तीन प्रमुख राहतें दी हैं। जिन महिला SSC अफसरों को 2020-21 में सिलेक्शन बोर्ड या आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (AFT) के फैसले से पहले ही स्थायी कमीशन (Permanent Commission) मिल चुका है, उनका स्टेटस अब नहीं बदला जाएगा।

जो महिला अफसर इस केस की लड़ाई के दौरान सेवा से बाहर हो गईं, उन्हें 20 साल की सेवा पूरी मानकर पूर्ण पेंशन और सभी रिटायरमेंट लाभ दिए जाएंगे। हालांकि उन्हें पिछला वेतन (एरियर) नहीं मिलेगा। अभी सेवा में जो महिला अफसर हैं, उन्हें 60% कटऑफ पूरा करने पर स्थायी कमीशन मिलेगा, बशर्ते अन्य जरूरी मंजूरी पूरी हो। यह आदेश JAG (जज एडवोकेट जनरल) और AEC (आर्मी एजुकेशन कोर) में काम करने वाली महिला अधिकारियों पर लागू नहीं होगा।

चीफ जस्टिस की बेंच ने आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की प्रक्रिया पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि Annual Confidential Report (ACR) कई बार पुरुषों की सोच के आधार पर लिखी गईं, जिससे महिलाओं की मेरिट प्रभावित हुई। महिलाओं को जरूरी ट्रेनिंग भी नहीं दी गई। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश दिए।

23 साल पुराना मामला

यह मुद्दा 23 साल पुराना है। वर्ष 2003 में महिला वकील बबीता पुनिया ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बाद में कई अन्य महिला अधिकारियों ने भी याचिकाएं दाखिल कीं। 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन सरकार ने 2019 में नई नीति बनाते हुए मार्च 2019 के बाद सेवा में आने वाली महिलाओं को ही स्थायी कमीशन देने का प्रावधान रख दिया, जिससे पुरानी लड़ाई लड़ रही महिलाएं वंचित रह गईं।

कोर्ट का साफ संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता। महिलाओं को अवसरों से वंचित रखना और गलत तरीके से अयोग्य ठहराना उनके करियर के साथ अन्याय है। कोर्ट ने भविष्य में निष्पक्ष चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए ACR लेखन, कट-ऑफ और मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा के भी निर्देश दिए हैं।यह फैसला उन महिला अधिकारियों के लिए न्याय का बड़ा कदम माना जा रहा है, जिन्होंने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 5 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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