नई दिल्ली। Supreme Court ने सोमवार को एक एनेस्थेटिस्ट को पोस्ट-सर्जरी जटिलता के आरोप में बरी कर दिया। आरोप था कि उन्होंने फोन पर नर्स को दवा बताई थी, जिससे मरीज की मौत हो गई।
कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी समाप्त होने के बाद एनेस्थेटिस्ट को आईपीसी की धारा 304-A के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि पोस्ट-सर्जरी जटिलता स्टाफ नर्स द्वारा दवा के गलत तरीके से लगाने से हुई थी, जो ऑफ-ड्यूटी एनेस्थेटिस्ट के भौतिक नियंत्रण से पूरी तरह बाहर थी।
कोर्ट का कहना था कि कानूनी रूप से, जिस एनेस्थेटिस्ट की ड्यूटी समाप्त हो चुकी है, उसे स्टाफ नर्स द्वारा की गई बाद की प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। भले ही अभियोजन पक्ष की दलील को सच मान लिया जाए कि अपीलकर्ता ने फोन पर पेनकिलर सुझाया था, तो भी यह पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द के लिए मानक चिकित्सकीय सलाह है, न कि घोर आपराधिक लापरवाही।
‘नर्स द्वारा एपिड्यूरल स्पेस को सही ढंग से ढूंढने में असफलता सेवा में कमी हो सकती है, लेकिन इसमें धारा 304-A आईपीसी लागू करने के लिए आवश्यक घोर दोष या मेन रिया बिल्कुल नहीं है।’ यह टिप्पणी न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने की, जबकि केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया गया जिसमें एनेस्थेटिस्ट के खिलाफ मेडिकल नेग्लिजेंस मामले (धारा 304-A आईपीसी) को खारिज करने से इनकार कर दिया गया था।
घटना के संबंध में बताया जाता है कि मरीज को मई 2002 में कन्नूर के धनलक्ष्मी अस्पताल में बवासीर की सर्जरी के लिए भर्ती किया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि सर्जरी के बाद जब मरीज को तेज दर्द हुआ, तो सीनियर एनेस्थेटिस्ट ने खुद दवा लगाने के बजाय नर्स को एनाल्जेसिक सेंसरकेन लगाने का निर्देश दिया। बाद में मरीज बेहोश हो गया और मर गया।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण एक्यूट कोरोनरी इंसफिशिएंसी बताया गया, जिसमें लेफ्ट कोरोनरी आर्टरी में 80% ब्लॉकेज था।
अपीलकर्ता-एनेस्थेटिस्ट ने जेकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) 6 SCC 1 केस का हवाला देते हुए बचाव किया कि फोन पर दवा बताना पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द के लिए मानक चिकित्सकीय सलाह है, न कि घोर आपराधिक लापरवाही।
न्यायमूर्ति वराले द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि यदि अपीलकर्ता ने सामान्य सतर्कता नहीं बरती होती, जो एक औसत चिकित्सक से अपेक्षित है, तो वे दोषी ठहराए जाते। लेकिन SOS कॉल के समय वे मौजूद नहीं थीं। अस्पताल में अन्य ऑन-ड्यूटी डॉक्टरों, जिनमें ऑन-ड्यूटी एनेस्थेसियोलॉजिस्ट भी शामिल थे, की मौजूदगी को अपीलकर्ता की लापरवाही नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट से पता चलता है कि अपीलकर्ता ने शाम 5 बजे अपनी शिफ्ट पूरी की और मरीज को स्थिर देखने के बाद ही अस्पताल छोड़ा। जब शाम 8 बजे इमरजेंसी हुई, तब अस्पताल में अन्य ऑन-ड्यूटी डॉक्टर, जिनमें ऑन-ड्यूटी एनेस्थेसियोलॉजिस्ट भी शामिल थे, मौजूद थे।
कोर्ट ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि अपीलकर्ता ने घर से SOS कॉल का जवाब दिया और पेनकिलर की सलाह दी, तो भी ऑन-ड्यूटी अस्पताल स्टाफ पर मानक पोस्ट-ऑपरेटिव पेन मैनेजमेंट को सही ढंग से लागू करने का भरोसा रखना तथ्यात्मक रूप से लापरवाही नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि वह कार्य ऐसा होना चाहिए जिसे ‘कोई भी चिकित्सक अपनी सामान्य समझ और सतर्कता में न करे या न करने दे’।
चिकित्सा पेशेवरों को तब तक लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब उन्होंने इलाज के दौरान उचित देखभाल और सावधानी बरती हो।एक्सपर्ट मेडिकल पैनल में एनेस्थेटिस्ट का न होना अभियोजन के लिए घातक साबित हुआ कोर्ट ने अभियोजन पक्ष में कानूनी कोर्ट का कहना था कि खामी भी बताई।
चार सदस्यीय एक्सपर्ट मेडिकल पैनल में कोई एनेस्थेटिस्ट शामिल नहीं था। जेकब मैथ्यू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा शुरू करने से पहले जांच अधिकारी को स्वतंत्र चिकित्सकीय राय लेनी चाहिए, अधिमानतः उसी विशेष शाखा के योग्य डॉक्टर से।











