SC Order: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि सीनियर सिटीजन्स यानी बुजुर्ग माता-पिता अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का पूरा अधिकार है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान और सुरक्षा देता है।
यह फैसला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता के मामले में आया। गुप्ता ने अपने बेटे और बहू को खुद की खरीदी हुई संपत्ति से निकालने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन दिया था। मामला तब गंभीर हो गया जब उनकी 81 साल की मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे-बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया था लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का कहना था कि 2007 के कानून में बुजुर्गों को बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को पलट दिया। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि ट्रिब्यूनल के पास बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा के लिए बच्चों को संपत्ति से निकालने का आदेश देने का अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। एक्ट की धारा 7 और 8 के तहत ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां दी गई हैं।
कोर्ट ने 2021 के एस. वनिता मामले समेत बाद के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति से बच्चों को हटाना भी बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा का एक जरूरी तरीका हो सकता है। इस फैसले से बुजुर्ग माता-पिता को अपनी संपत्ति पर ज्यादा सुरक्षा और कानूनी ताकत मिल गई है।








