नई दिल्ली। वेब मीडिया ने टीवी और वेबसाइट्स को वैश्विक स्तर पर पीछे छोड़ दिया है। भारत का मीडिया इकोसिस्टम वीडियो की ओर बड़े पैमाने पर पलायन, घटते विश्वास और पारंपरिक समाचार आदतों को छोड़ती नई पीढ़ी का सामना कर रहा है, जैसा कि Reuters Digital News Report 2026 में बताया गया है।
पहली बार वैश्विक स्तर पर यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने टीवी और समाचार वेबसाइट्स को समाचार पहुंचाने का सबसे लोकप्रिय माध्यम बनाकर पीछे छोड़ दिया है।
यह बदलाव लगभग दो-तिहाई बाजारों में हो चुका है, जबकि पश्चिमी और मध्य यूरोप तथा अधिक समृद्ध एशियाई बाजारों में सीधा एक्सेस अभी भी आगे है।”ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के Reuters Institute for the Study of Journalism द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट समाचार खपत को ट्रैक करती है। इसका 2026 संस्करण, जो 48 बाजारों को कवर करता है, बताता है कि अब न्यूज कम विश्वसनीय, दैनिक जीवन में कम केंद्रित और मुद्रीकरण में कठिन होता जा रहा है।
2021 के बाद से सोशल और वीडियो नेटवर्क्स समाचार का शीर्ष स्रोत बन गए हैं, जिनका अब 54 फीसदी लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है। वे टीवी से आगे हैं, जो इसी अवधि में 64 फीसदी से घटकर 52 फ़ीसद लोगों तक पहुंच रहा है। हालांकि सोशल नेटवर्क्स खुद अपने 56 फिक्स्ड बेसलाइन से थोड़ा फिसल गए। समाचार वेबसाइट्स और ऐप्स इस दौरान तेजी से 63 फीसदी से घटकर 51 फीसदी रह गए। रेडियो 26 फीसदी से 21 फीसदी और प्रिंट 24 फॉसी से 16 फीसदी रह गया। बिल्कुल कोई समाचार न देखने और पढ़ने वाले लोगों का हिस्सा 4 फीसदी से बढ़कर 6 फीसीद हो गया।
इस बीच, समाचार में कुल विश्वास 2015 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। केवल 37 फीसदी लोग कहते हैं कि वे ज्यादातर समय ज्यादातर समाचारों पर भरोसा करते हैं, जो 2025 से 3 प्रतिशत अंक कम है। संयुक्त राज्य अमेरिका में यह आंकड़ा 25 फीसदी है, और दक्षिणपंथी अमेरिकियों में सिर्फ 15 फीसदी। कुछ बाजारों में मामूली बढ़ोतरी हुई, जैसे केन्या में 3 अंक, जापान और स्पेन में 2-2 अंक।
यूट्यूब, व्हाट्सएप और विश्वास की कमी की वजह से भारत से प्राप्त आंकड़े डिजिटल और सोशल स्पेस की ओर बड़े पलायन को रेखांकित करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘भारत में विश्वास स्तर में 4 प्रतिशत अंक की कमी आई’, कुल समाचार विश्वास 39 फीसदी है जो वैश्विक औसत से 2 प्रतिशत अंक ऊपर है। यह एक उल्लेखनीय बदलाव है।
2025 की रिपोर्ट में भारत के विश्वास स्तर को “पिछले कुछ वर्षों में काफी स्थिर” बताया गया था, तब यह 43 फीसद था। प्लेटफॉर्म्स पर “लगभग 58 फीसद लोग समाचार के लिए यूट्यूब पर निर्भर हैं”, जबकि व्हाट्सएप समाचार का दूसरा सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म 56 फीसदी के साथ है, जो 2021 से 10 अंक ऊपर है। साथ ही, 52 फीसद भारतीय कभी-कभी या अक्सर समाचार से बचते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जैसे देशों में यूट्यूब के लिए समाचार उपयोग और भी अधिक है, इसे ‘एक अधिक परिपक्व प्लेटफॉर्म’ बताया गया है जो 2021 के बाद कम बढ़ा है, लेकिन दुनिया भर में समाचार के लिए सबसे बड़ा वीडियो नेटवर्क बना हुआ है।
लीगेसी टीवी पूरी तरह से ढह नहीं गया है। रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है कि ‘लीगेसी स्रोत जैसे टीवी (44 फीसद) ने समाचार के लिए लोकप्रियता बनाए रखी है, पारंपरिक सब्सक्रिप्शन मॉडल या कनेक्टेड टीवी जैसे कई रास्ते प्रदान करके, पारंपरिक प्रसारण और डिजिटल कंटेंट फॉर्मेट्स के बीच की रेखाओं को धुंधला करते हुए।’
रिपोर्ट भारत को उन मामलों में से एक के रूप में पहचानती है जहां प्रेस फ्रीडम पर दबाव ने क्रिएटर लैंडस्केप को आकार दिया है। ‘जहां प्रेस फ्रीडम पर दबाव है, वहां हम समाचार क्रिएटर्स को विरोध और जांच के स्रोत के रूप में पाते हैं।’
भारत में, ‘जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रमुख मीडिया आउटलेट्स खासकर टीवी पर काफी नियंत्रण रखा, वहां सबसे ज्यादा उल्लेखित दो क्रिएटर्स ध्रुव राठी और रवीश कुमार हैं, जो दोनों सरकार की आलोचना के लिए जाने जाते हैं।’
वैश्विक स्तर पर, व्यक्तिगत समाचार क्रिएटर्स इस लैंडस्केप में अस्पष्ट स्थिति में हैं। दुनिया में 27 फीसदी लोग क्रिएटर्स या इन्फ्लुएंसर्स पर समाचार के लिए निर्भर हैं, हालांकि केवल 3 फीसद कहते हैं कि क्रिएटर्स उनकी सभी समाचार जरूरतों को पूरी तरह पूरा करते हैं। दर्शक आमतौर पर क्रिएटर्स को पारंपरिक आउटलेट्स की तुलना में अधिक मनोरंजक और समझने में आसान पाते हैं, लेकिन कम विश्वसनीय और कम निष्पक्ष।









