राजस्थान की भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बुधवार से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में जो अशांत क्षेत्र बिल लाने जा रही है, उसके राजनीतिक निहितार्थ को समझने में कोई चूक नहीं करनी चाहिए।
“राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और किरायेदारों को परिसर से बेदखली से बचाने के प्रावधान संबंधी विधेयक, 2026” के पक्ष में राज्य सरकार की ओर से दिए जा रहे तर्क ही अपने आपमें संदेह पैदा करते हैं कि इसके निशाने कौन पर हैं।
दरअसल अशांत क्षेत्र उन क्षेत्रों को कहा जा रहा है, जहां कथित रूप से जनसांख्यिकी असंतुलन हो रहा है और जहां किसी खास समुदाय के क्लस्टर बन रहे हैं। सवाल है कि इसे तय करने का पैमाना क्या है और यह कैसे तय होगा, जब संविधान में किसी भी नागरिक को कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों को छोड़कर देश में कहीं भी रहने और व्यवसाय करने की आजादी है।
इस बिल के पारित होकर कानून बनने से सरकार को कैसे असीमित अधिकार मिल जाएंगे, इसे इसी समझा जा सकता है कि सरकार के पास यह अधिकार होगा कि वह किसी इलाके को अशांत घोषित कर दे और एक बार ऐसी अधिसूचना जारी होने के बाद उस इलाके में अचल संपत्ति की खरीद-फरोख्त पर तीन साल के लिए रोक लग जाएगी।
इस बिल को खासतौर से मुस्लिमों के खिलाफ माना जा रहा है, तो इसके पीछे मजबूत तर्क और भाजपा तथा आरएसएस की उस रणनीति को भी देखा जा सकता है, जिसके कारण अल्पसंख्यकों की निष्ठा पर बार-बार संदेह जताया जाता है।
यह बात आज बात किसी से छिपी नहीं है कि किसी मुस्लिम को गैरमुस्लिम इलाकों में या सोसाइटी में किराए का तो छोड़िए खरीदने पर भी अधिकांश मामलों में घर नहीं मिलता।
आवासीय सोसाइटियों में हिंदू धार्मिक आयोजन बहुत आम हैं, लेकिन यह हाल का ही मामला है, जब उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक सूने घर में नमाज अता कर रहे कुछ लोगों को पुलिस उठाकर ले गई थी।
कांग्रेस इस बिल को लेकर हमलावर है और उसे गुजरात में तीन दशक से लागू अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और किरायेदारों को परिसर से बेदखली से बचाने के प्रावधान संबंधी अधिनियम, 1991 की प्रतिलिप बता रही है और आरोप लगा रही है कि यह गुजरात मॉडल है।
दरअसल कांग्रेस को अपना होम वर्क ठीक करने की जरूरत है। गुजरात में इसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लागू जरूर किया था, लेकिन 2002 के दंगों के बाद इसका ज्यादा इस्तेमाल हुआ। बाद में इस कानून में संशोधन भी किए गए। गुजरात हाई कोर्ट ने इस अधिनियम की आड़ में प्रशासन द्वारा की जा रही मनमानियों पर कई बार अंकुश लगाया है।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें अहमदाबाद के एक मुस्लिम कारोबारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा।
हैरत नहीं कि इस कानून को संपत्ति के अधिकार से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 300 ए और समानता के अधिकार अनुच्छेद 14 की कसौटी पर कसने के लिए अदालत में चुनौती दी जाए।
यह सचमुच पीड़ादायक है कि सद्भाव के बजाए राजस्थान की भाजपा सरकार का यह कदम समुदायों के आपसी भरोसे में संदेह पैदा करता है।
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