नई दिल्ली। यूपी में पंकज चौधरी के हाथ में प्रदेश की भाजपा कमान देना योगी आदित्यनाथ को साधने का खेल कम है बल्कि आगामी विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव की तैयारी से ज़्यादा जुड़ा हुआ है। जहां तक योगी को साधने सवाल केवल पंकज चौधरी ताजपोशी से पूरा नहीं होगा यह भाजपा जानती है।
अब अगली कोशिश मंत्रिमंडल में फेरबदल बतौर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का क़द बढ़ाने की होगी। यक़ीनन भाजपा यूपी में वन मैन शो से मुश्किलें महसूस कर रही है लेकिन उसके लिए फ़िलहाल पिछड़ों के बीच घटता वर्चस्व चुनौती की एक बड़ी वजह है।
भाजपा का नेतृत्व जानता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चाहते ना चाहते हुए भी सवर्णवादी खासतौर से ठाकुरवादी साबित हो रहे हैं। पंकज चौधरी की बतौर प्रदेश अध्यक्ष ताजपोशी पिछड़े समुदाय में फिर से विश्वास हासिल करने और समाजवादी पार्टी की पीडीए की राजनीति के मुक़ाबले में एक मज़बूत जवाब देने से जुड़ी हुई है।
यूपी में भाजपा को महज दो साल बाद फिर से चुनाव मैदान में जाना है। 2017 और फिर 2022 का विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ा गया और दोनों ही चुनाव में बीजेपी को जीत हासिल हुई लेकिन यह भी सच है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा।
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश में 62 सीटें जीतने में सफल रही थी लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी केवल लगभग 33 सीटें ही जीत पाई। यानी पार्टी की सीटें लगभग आधा हो गईं। खासकर पिछड़े और मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया और कई सीटें बीजेपी से छीन लीं।
भाजपा ने सात बार के सांसद पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का निर्णय क्यों लिया इसके जवाब में राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व संपादक उत्कर्ष सिंह कहते हैं कि इसको आप एक कोण से मत देखिए। आपको इसके लिए गोरखपुर और उसके आसपास की संसदीय सीट के इतिहास को समझना होगा, जिस पर योगी आदित्यनाथ अपना वर्चस्व चाहते हैं।
योगी के विरोधी खेमे के माने जाने वाले शिव प्रताप शुक्ला को यहां से १४ साल का राजनीतिक वनवास मिला, लेकिन फिर न्हें राज्यसभा के रास्ते कैबिनेट मंत्री और फिर राज्यपाल बनाया गया। योगी के दूसरे विरोधी राधामोहन अग्रवाल को महासचिव और दो राज्यों का प्रभारी बनाया गया।
कमलेश पासवान चार बार सांसद थे। योगी के साथ उनके कभी रिश्ते अच्छे नहीं रहे। अमित शाह ने उन्हें मंत्री बनाकर ताकतवर बनाया। हालांकि कमलेश अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। उत्कर्ष कहते हैं कि इस कड़ी में चौथा नाम सात बार के सांसद पंकज चौधरी का है जो गोरखपुर के किसी कार्यक्रम में कभी नहीं दिखे लेकिन योगी के विरोधी हैं।
महागराजगंज में योगी प्रभुत्व बढ़ाना चाहते हैं लेकिन बढ़ा नहीं पाते हैं। दरअसल इस कवायद से योगी को चारों तरफ़ से घेरा गया है। उत्कर्ष कहते हैं इसका मतलब साफ़ है कि अब संगठन में योगी का सीधा हस्तक्षेप होगा। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं यूपी में भाजपा की सारी की सारी ताक़त गोरखपुर मंडल में निहित हो गई है। 15 मंडल केवल झुनझुना बजायें उन्हें कोई पूछने वाला नहीं हैं।
सुरेंद्र कहते हैं कि पंकज चौधरी की जाति महत्वपूर्ण नहीं है उनकी जाति तो व्यापारी है। वो राहत रूह तेल के मालिक हैं। मुझे यह कहने में कोई भ्रम नहीं है कि उनके बहाने भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी आदित्यनाथ को सेट करना चाहता है। सुरेंद्र कहते हैं कि सरकार को उनसे जुड़े कथित नागरिकता विवाद पर भी जवाब देना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी से पहले चार कुर्मी प्रदेश अध्यक्ष हो चुके है। इससे पहले स्वतंत्र देव सिंह, विनय कटियार और ओम प्रकाश सिंह भी इस पद पर रह चुके हैं।
बीजेपी के एक नेता कहते है ”पंकज चौधरी के आने से निःसंदेह कुर्मी वोट बैंक मजबूत होगी। यह सच है बीजेपी ने पहले ही केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश की थी।
भाजपा ने चौधरी धर्मपाल और संदीप सिंह आदि पिछड़ों को मंत्री बनाया और अनुप्रिया पटेल, ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा और निषाद पार्टी के संजय निषाद से गठबंधन किया है।
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ छोड़ने के बावजूद बीजेपी ने दारा सिंह चौहान को प्रदेश में मंत्री बनाया हुआ है। पंकज के अध्यक्ष बनने से निःसंदेह पार्टी के भीतर पिछड़े नेतृत्व की कमी की भरपाई होगी, लेकिन इससे योगी को कितना साधा जा सकेगा यह वक्त बताएगा।











