2,000 से अधिक नागरिकों ने SIR पर सीजेआई से की हस्तक्षेप की मांग

नई दिल्ली। 2,000 से अधिक शिक्षाविदों, वकीलों, पत्रकारों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं और चिंतित नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों को संबोधित एक याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें भारत के चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के चल रहे तथा विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण यानि SIR पर तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई है।
याचिका में मतदाता डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण, चुनावी फॉर्म में बदलाव, पुनरीक्षण प्रक्रिया में ईसीआईनेट टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म की भूमिका और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने की संभावना पर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं।याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच करने का आग्रह किया है।हस्ताक्षरकर्ताओं में देश भर के प्रमुख शिक्षाविद, पूर्व सरकारी अधिकारी, वकील, पत्रकार, लेखक, कलाकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं।
100 पूर्व सिविल सेवकों ने भी एसआईआर को स्थगित करने की इसी तरह की अपील की है। पत्र का मजमून देखें।

भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के साथी न्यायाधीशों को खुला पत्र
विषय: भारत के चुनाव आयोग के असंवैधानिक कामकाज, मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर तत्काल स्थगन/रद्द करने संबंधी स्वतः संज्ञान न्यायिक हस्तक्षेप के लिए अत्यावश्यक याचिका
माननीय मुख्य न्यायाधीश और माननीय न्यायाधीशगण,
हम यह खुला पत्र सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का तत्काल और अत्यावश्यक ध्यान भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के उच्चतम स्तर पर हो रही गंभीर अनियमितताओं, संस्थागत टूटन और कथित अवैधताओं की ओर आकर्षित करने के लिए लिख रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट से पता चला है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभ्यास के तहत भारत की चुनावी सूची और मतदाता डेटाबेस की मूल अखंडता गंभीर रूप से compromised हो रही है।

  1. आंतरिक असहमति और वैधानिक आदेशों की अवहेलना:
    आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, तीन चुनाव आयुक्तों में से दो—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार फाइल पर आपत्ति दर्ज की है कि निर्णय उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत बहुसदस्यीय ढांचा सामूहिक, बहुमत-आधारित निर्णय लेने का आदेश देता है। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तहत प्रमुख परिचालन निर्देश और सॉफ्टवेयर संशोधन reportedly एकतरफा लागू किए गए, जिससे आयोग के बहुमत की लिखित आपत्तियों को सीधे दरकिनार किया गया।
  2. फॉर्म 6 में अनधिकृत और अवैध बदलाव:
    वैधानिक आधार या बहुसदस्यीय मंजूरी के बिना फॉर्म 6 (नए मतदाता पंजीकरण) में बदलाव किए गए, जिसमें पहली बार मतदाताओं से यह घोषणा करनी पड़ती है कि उनका या उनके माता-पिता का नाम पिछले एसआईआर रोल में था या नहीं। चुनाव आयुक्त संधू ने फाइल पर स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि यह जोड़ “अनधिकृत और अवैध” है, जिससे युवा मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी हो रही है।
    इन लिखित आपत्तियों के बावजूद यह संशोधन अभी भी लागू है।
  3. केंद्रीकृत तकनीकी ढांचा (ईसीआईनेट) क्षेत्रीय अधिकारियों को दरकिनार कर रहा है:
    जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13बी के तहत चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ही एकमात्र वैधानिक प्राधिकारी हैं जो चुनावी सूची में नाम जोड़ने, संशोधित करने या काटने के लिए अधिकृत हैं। हालांकि, दिल्ली स्थित ईसीआई मुख्यालय से सीधे प्रबंधित केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर सिस्टम (ईसीआईनेट) ने स्थानीय वैधानिक प्राधिकारियों को प्रभावी रूप से दरकिनार कर दिया है:
  • गोवा में मताधिकार से वंचित करना: गोवा में ईआरओ ने दस्तावेजों की जांच के बाद 97 वैध मतदाताओं को मंजूरी दी। फिर भी केंद्रीकृत बैकएंड सॉफ्टवेयर लॉक के कारण स्थानीय अधिकारी इन नामों को अंतिम सूची में बहाल नहीं कर सके।
  • पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को शामिल करने के खिलाफ अपील: पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा चुनावी सूची में शामिल किए गए मतदाताओं को काटने के लिए 16 लाख से अधिक अपीलें दाखिल की गईं। यह तीन आयुक्तों में से दो और पश्चिम बंगाल सीईओ की जानकारी या अनुमति के बिना किया गया।
  1. मनमाने ढंग से
    चल रहे एसआईआर अभ्यास में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, जिससे व्यवस्थित मताधिकार-हरण और उचित प्रक्रिया की कमी पर गंभीर सार्वजनिक चिंता पैदा हुई है।
    प्रार्थना और मांगी गई राहत
    स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक संरचना को खतरे में डालने वाले इन अभूतपूर्व घटनाक्रमों के आलोक में, अधोहस्ताक्षरकर्ता विनम्रतापूर्वक माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया से अपनी अंतर्निहित स्वतः संज्ञान अधिकारिता का प्रयोग करने और निम्नलिखित आदेश देने का आग्रह करते हैं:
  2. स्वतः संज्ञान लें: एसआईआर अभ्यास और ईसीआईनेट की तैनाती के संबंध में भारत के चुनाव आयोग के परिचालन और प्रशासनिक आचरण की स्वतः संज्ञान कार्यवाही शुरू करें।
  3. विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द/स्थगित करें: उभरते नए तथ्यों के आलोक में इसकी वैधता और प्रक्रियात्मक अखंडता की गहन, स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा लंबित रहने तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर अभ्यास को तत्काल स्थगित और रद्द करें।
  4. जांच और जवाबदेही के निर्देश: मतदाता पंजीकरण सॉफ्टवेयर/फॉर्म में मनमाने, अनधिकृत बदलावों की स्वतंत्र, अदालत-निगरानी वाली जांच का निर्देश दें और वैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने तथा बहुसदस्यीय आयोग के संवैधानिक आदेश की अवहेलना करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित दंडात्मक/प्रक्रियात्मक कार्रवाई का निर्देश दें।
  5. ECI NET ढांचे का ऑडिट: इस माननीय न्यायालय द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति द्वारा ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म का तत्काल, व्यापक सुरक्षा और कानूनी ऑडिट कराने का निर्देश दें ताकि कानून के अनुसार स्थानीय चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को विकेंद्रीकृत नियंत्रण बहाल किया जा सके और यह सत्यापित किया जा सके कि वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की प्लेटफॉर्म तक पहुंच थी या नहीं।
  6. मताधिकार-वंचित मतदाताओं की बहाली: तकनीकी खराबी, सॉफ्टवेयर लॉक या अनधिकृत प्रक्रियात्मक संशोधनों के कारण जिन मतदाताओं के नाम काटे गए, उन्हें तत्काल बहाल करने का आदेश दें।
    स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला हैं और हमारे संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं। जब चुनावी सूची की रक्षा के लिए बनाए गए संस्थागत सुरक्षा उपाय अंदर सेcompromised हो जाते हैं, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

    भवदीय,
    प्रो. आदित्य मुखर्जी,
    प्रो. मृदुला मुखर्जी,
    अंजली भारद्वाज,
    प्रो. गौहर रजा,
    अमृता जोहरी,
    शबनम हाश्मी
    आदि

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