नई दिल्ली। महज तीन महीने पहले पश्चिम बंगाल में रिकॉर्डतोड़ जीत हासिल करने वाली (BJP) के लिए यह दुःस्वप्न जैसा था कि किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिए अजेय समझे जाने वाले उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ेगा।
बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश की एक एक विधानसभा सीटों पर भाजपा को मिली हार के निहितार्थ राजनैतिक विश्लेषक जो भी निकालें यह परिणाम बताते हैं कि भाजपा का जनाधार पहले से कमजोर पड़ रहा है साथ ही दिग्गज नेताओं की जनता पर पकड़ भी कमजोर पड़ रही है।
बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीटों के नतीजे आज घोषित हो गए। इन सीटों पर जंतर मंतर, समेत देश के कोने कोने और बिहार में चल रहे छात्र आंदोलन के तत्काल बाद 30 जुलाई को वोटिंग हुई थी।
इन चुनावों पर यकीनन राम जन्मभूमि चंदा घोटाले की भी प्रतिछाया थी लाठी चार्ज और पैलेट गन की चोट से निकली चीखें भी थी। आमतौर पर विधानसभा उपचुनाव को लेकर बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं देखा जाता है, लेकिन इस बार बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ख़ुद चुनाव मैदान में उतर गए। प्रशांत के लिए यह निर्णय आत्मघाती हो सकता था क्योंकि बांकीपुर की सीट 1999 से ही भाजपा के खाते में जा रही थी।
वहीं मध्य प्रदेश की दतिया सीट से पूरी तैयारी करने के बावजूद नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिए जाने से जनता उद्वेलित हो गई। भाजपा नेतृत्व के इस फ़ैसले के बाद उनके समर्थकों में नाराज़गी भी देखी गई थी। इस सीट को लेकर कांग्रेस का आत्मविश्वास पहले से था लेकिन उम्मीदवार नहीं था।
कम वोटिंग फीसद और बांकीपुर की जंग
इस बार काफ़ी कम वोटिंग ने चुनावों को दिलचस्प बना दिया। बांकीपुर में इस बार क़रीब 35 फ़ीसदी वोटिंग हुई, वैसे हमेशा से यहाँ कम वोटिंग होती रही है। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में यहाँ 41.35 फीसदी मतदान हुआ था तब बीजेपी के नितिन नबीन ने आरजेडी की रेखा गुप्ता को क़रीब 52 हज़ार मतों से हराया था। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के खाली करने के बाद से रिक्त थी। इस सीट से बीजेपी ने नीरज कुमार, जन सुराज पार्टी ने प्रशांत किशोर और आरजेडी ने रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा। प्रशांत किशोर के चुनाव में उतरने से यह सीट हाई प्रोफ़ाइल हो गई हालांकि कई राजनीतिक जानकारों ने इसे त्रिकोणीय मुक़ाबला बताया।
भाजपा के गढ़ में प्रशांत किशोर की चुनौती
बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद से ही सबकुछ अप्रत्याशित नजर आने लगे। बीजेपी की ओर से घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा ने अचानक अंतिम समय में पारिवारिक कारण बताते हुए 10 जुलाई को अपना नामांकन वापस ले लिया था जबकि कुछ घंटे पहले तक बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बांकीपुर में अभिषेक कुमार के लिए लोगों से वोट मांग रहे थे।
बताया जाता है कि पार्टी प्रशांत के खिलाफ ज्यादा मजबूर उम्मीदवार उतारना चाहती थी। इसके बाद पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को अपना उम्मीदवार घोषित किया। इस पूरे घटनाक्रम पर प्रशांत किशोर का कहना था कि जनता के पास अब विकल्प आ गया है तो बीजेपी को अब उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।
सम्राट चौधरी का नेतृत्व और जनाक्रोश
बिहार में यह मतदान तब हुआ जब भरत तिवारी इनकाउंटर के बाद जनाक्रोश चरम पर था, नीतिश कुमार की जगह सम्राट चौधरी ले लिए थे। छात्र आंदोपन के साथ चंदा घोटाले की चर्चा चहुंओर थी। बांकीपुर में कायस्थों के 14 से 15 फीसदी वोट और सवर्णों के 50 फीसदी से ज्यादा वोट भी भाजपा के लिए राह नहीं बना सके। 18,953 वोट से प्रशांत किशोर चुनाव जीत गए। नितिन नवीन और प्रतिद्वंदी नीरज कुमार अपने वार्ड में भी चुनाव हार गए।
नरोत्तम का दुख और दतिया की जंग
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस की ओर से घनश्याम सिंह के विरुद्ध भाजपा की ओर से आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया तो उम्मीदवारी को लेकर ही हड़कंप मच गया। भाजपा ने दतिया के पूर्व विधायक, पूर्व गृहमंत्री और कभी सीएम कैंडिडेट समझे जाने वाले नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया था जबकि वो लगातार चुनावी तैयारियों में व्यस्त थे।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटते ही उनके समर्थक नाराज होकर सड़कों पर उतर आए। नरोत्तम मिश्रा कई बार रोते हुए नजर आए। बीजेपी ने इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया यकीनन वो पुरानी पीढ़ी को दरकिनार करने की कोशिश थी। भाजपा ने पुराने कांग्रेसी और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रभारी बनाया था।
पहले भी जीती थी कांग्रेस
इसके पहले साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को 7,500 से अधिक मतों से हराया था। हालांकि, दिल्ली की एक अदालत ने अप्रैल में धोखाधड़ी के एक मामले में भारती को तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई और दतिया सीट पर उपचुनाव कराए गए। कांग्रेस में गजब यह हुआ कि राजेंद्र भारती मतगणना से एक दिन पहले पार्टी से दगाबाजी करने के आरोप में निष्कासित कर दिए गए।
दतिया में मोहन और ज्योतिरादित्य की भी पराजय
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ,प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व और पार्टी के चुनावी प्रबंधन के लिए भी चुनाव के जरिए परीक्षा मानी जा रही थी। कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी घनश्याम सिंह के साथ प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी , दिग्विजय सिंह, उमंग सिंघार समेत तमाम दिग्गज नेता दतिया में कैंप करने लगे।
आजाद समाज पार्टी ने दामोदर सिंह यादव को मैदान में उतारकर मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास किया। मगर मुख्य लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच रही जिसमें कांग्रेस ने जीत हासिल की। इस उपचुनाव के नतीजे से प्रदेश सरकार की स्थिरता या विधानसभा में बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अगले साल प्रस्तावित नगर निकाय और पंचायत चुनावों की रणनीति तय करने में इसका असर हो सकता है।
मांजलपुर की एकतरफा जंग
मांजलपुर में मुख्य मुक़ाबला सत्तारूढ़ बीजेपी के उम्मीदवार सतीश गोविंदभाई पटेल और कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री भीखाभाई रबारी के बीच हैगुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में 37.5% मतदान हुआ। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां 63.61 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था।
मांजलपुर में मुख्य मुक़ाबला सत्तारूढ़ बीजेपी के उम्मीदवार सतीश गोविंदभाई पटेल और कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री भीखाभाई रबारी के बीच रहा। सतीश पटेल वडोदरा नगर निगम के पूर्व पार्षद रह चुके हैं।योगेश पटेल गुजरात की राजनीति के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। वे आठ बार विधायक चुने गए.
उन्होंने 1990 से 2007 तक पांच बार वडोदरा की रावपुरा सीट का प्रतिनिधित्व किया। परिसीमन के बाद वे मांजलपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे और 2012, 2017, 2022 में लगातार जीत दर्ज की।इस तरह उन्होंने 36 वर्षों के राजनीतिक सफर में विधानसभा चुनावों में लगातार आठ जीत हासिल कीं।









