झारखंड (Jharkhand) के देवघर जिले के दुधानी गांव के रहने वाले मेराज अंसारी को साल 2025 के 22 मई को पुलिस ने हिरासत में लिया था। उन पर साइबर ठगी का आरोप था। पूछताछ के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी। पुलिस उन्हें इलाज के लिए देवघर सदर अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों का कहना है कि पुलिस ने मेराज की पिटाई की, जिससे उनकी मौत हुई। वहीं पुलिस के मुताबिक मेराज पहले से बीमार थे और इलाज के दौरान उसकी मौत हुई।
झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष प्रणेश सॉलमेन बताते हैं कि,”जिस तरह से घटना हुई,वह कई तरह की शंका उत्पन्न की। साइबर थाना, पालाजोरी थाना और सारठ थाना की पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह कहीं से भी बर्दाश्त करने लायक नहीं था। साइबर के अपराध में जब किसी भी आरोपी को पकड़ा जाता है तो उसके साथ मारपीट करने का अधिकार पुलिस को नहीं है क्योंकि साइबर अपराध जघन्य अपराध में नहीं आते है। यदि उसके बाद भी नियमों को ताक पर रखकर कार्रवाई की गई है।”
सितंबर 2020 में दुमका केंद्रीय कारागार में बंद विचाराधीन बंदी संतोष मेहरिया इलाज के दौरान की मौत हो गई। सरैयाहाट थाना क्षेत्र से अवैध लकड़ी के साथ पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। जेल में अचानक तबियत बिगड़ने पर 60 वर्षीय संतोष को केंद्रीय कारागार से डीएमसीएच अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पुलिस के अनुसार उन्हें उच्च रक्तचाप और डायबिटीज जैसी बीमारियां थीं।
मृतक के परिजन मंजू मेहरिया ने आरोप लगाया था कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी कोई डॉक्टर उनको देखने तक नहीं आया। हालात बिगड़ने पर उन्होंने बार-बार रेफर करने की गुहार लगाई, लेकिन किसी भी डॉक्टर ने उनकी बातों को नहीं सुना। पुलिस को भी ध्यान देना चाहिए था।

30 दिसंबर 2025 को मानगो के गोकुल नगर बस्ती निवासी 18 वर्षीय जीत महतो की पुलिस अभिरक्षा में मौत हुई। स्थानीय पत्रकार के मुताबिक चोरी का एक छोटा मोबाइल खरीदने के संदेह में पुलिस ने जीत महतो को देर रात घर से जबरन हिरासत में लिया था। थाना में पुलिस की प्रताड़ना से उसकी हालत बिगड़ गई और बाद में उसकी मौत हो गई। मामले को दबाने के लिए थाना प्रभारी की ओर से परिजनों को दो लाख रुपये दिए गए। आनन-फानन में पोस्टमार्टम कराया गया और तुरंत अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।
जनवरी 2026 में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने अजीत महतो की पुलिस हिरासत में हुई मौत को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को एक पत्र लिखकर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हुए स्वतंत्र और न्यायिक जांच की मांग की है।
पत्र के मुताबिक बिना किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के सिर्फ ‘अप्राकृतिक मृत्यु’ का केस दर्ज किया गया और मृतक के परिजनों से जबरन सादा कागज पर हस्ताक्षर कराकर दो लाख रुपये दिए गए। इस मुआवजे का कोई स्पष्ट कानूनी आधार या सही प्रक्रिया बताई नहीं गई, जिससे मामले की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। पत्र में यह भी बताया गया है कि गिरफ्तारी के बाद करीब दो दिन तक परिजनों को अजीत महतो से मिलने नहीं दिया गया, जिससे पुलिस यातना से मौत होने का शक हुआ। इस दौरान मृतक की गर्भवती पत्नी ने एक नवजात बेटी को जन्म दिया। अजीत परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था, और उसकी मौत के बाद परिवार गंभीर सामाजिक, आर्थिक और मानसिक संकट में है।
यहां सिर्फ तीन घटनाएं का जिक्र है लेकिन झारखंड में इस तरह की घटना आम हो चुकी है। यहां बीते आठ साल में हर सातवें दिन एक व्यक्ति की मौत पुलिस या न्यायिक हिरासत में हो रही है।
गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव की ओर से दाखिल हलफनामे के मुताबिक साल 2018 से अब तक न्यायिक हिरासत में 437 लोगों की मौत हुई है, जबकि पुलिस हिरासत में करीब 45 लोगों की जान गई। यह आंकड़ा एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें न्यायिक और पुलिस हिरासत में हुई सभी मौतों की न्यायिक जांच की मांग की गई है। इन मामलों में परिजनों को सूचित करना, 24 घंटे के अंदर न्यायिक जांच का आदेश देना एवं पब्लिक नोटिस जारी करना जैसी जरूरी प्रक्रियाओं की महज खानापूर्ति की गई है।
24 मार्च को लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया कि अप्रैल 2021 से मार्च 2026 के बीच पूरे देश में हिरासत (पुलिस व न्यायिक हिरासत) में 806 लोग मरे हैं। इन आंकड़ों में झारखंड से 24 मौतें शामिल हैं। लेकिन राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़े इन केंद्रीय आंकड़ों से मेल नहीं खाते है।
दुमका के रहने वाले नवीन कानूनी सलाहकार का काम करते है। वह बताते हैं कि,”हिरासत में लोगों की मौतें होती रहती हैं, और जिम्मेदार अधिकारियों को शायद ही कभी सजा मिलती है। सजा देगा कौन? कानून का रखवाला ही जब….”
1999 से 2023 के बीच, भारत में पुलिस हिरासत में कुल 2,253 लोगों की मौत हुई, यानी औसतन प्रति वर्ष 90 मौतें। इसी अवधि में, मानवाधिकार उल्लंघन के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ कुल 2,373 मामले दर्ज किए गए। इनमें से केवल 3 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई, वो भी 2017 में। 2018 से 2023 तक लगातार छह वर्षों में दोषसिद्धि की संख्या शून्य रही।
संसद को हिरासत में मृत्यु के लिए प्रभावी कानून बनाना चाहिए
पीईएस विश्वविद्यालय से जुड़ी कस्तूरी भट्टाचार्य बताती हैं कि, ‘किसी संवैधानिक लोकतंत्र में हिरासत में मृत्यु और पुलिस की ज्यादतियां मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन हैं। जब कोई व्यक्ति पुलिस या राज्य की हिरासत में घायल होता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लोगों के जीवन की रक्षा करने की राज्य की जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं।’
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज के आर्टिकल के मुताबिक पश्चिम बंगाल में किए गए कानूनी अध्ययन कहता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 330 उन मामलों पर लागू होती है जहां किसी को जबरन बयान लेने के इरादे से जानबूझकर चोट पहुँचाई जाती है, इसलिए यह पुलिस अधिकारियों पर भी लागू हो सकती है। फिर भी हकीकत यह है कि हिरासत में हुई मौतों की प्रभावी और निष्पक्ष जांच बहुत कम होती है और कई परिवार न्याय नहीं पाते। इसलिए विधायिका और न्यायपालिका को इन घटनाओं की त्वरित और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करनी चाहिए, मौजूदा कानूनों में संशोधन कर मानवाधिकार-आधारित कड़े दंड लागू करने चाहिए, और संसद को हिरासत में मृत्यु के लिए प्रभावी कानून बनाना चाहिए ताकि पुलिस अधिकारियों को ऐसे कृत्यों से पहले गंभीर कानूनी परिणामों का भय हो और पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके।
झारखंड हाईकोर्ट का आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने 14 मई 2026 को आदेश दिया कि पुलिस या जेल हिरासत में मौत या दुष्कर्म के हर मामले में न्यायिक जांच अनिवार्य होगी। मुख्य न्यायाधीश सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने जनहित याचिका W.P.(PIL) 1218/2022 पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया कि अब कस्टोडियल डेथ यानी हिरासत में मौत के मामलों की जांच केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट ही करेंगे।
कार्यपालक दंडाधिकारी (एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) द्वारा की गई जांच कानून के अनुरूप नहीं मानी जाएगी।
खंडपीठ ने झारखंड लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया है कि वह नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC), नई दिल्ली की गाइडलाइन के अनुरूप एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करें, ताकि हिरासत में मौत या दुष्कर्म के मामलों की निष्पक्ष और व्यवस्थित जांच सुनिश्चित की जा सके।
साथ ही मुख्य सचिव और गृह सचिव को 30 दिनों के भीतर सभी जिलों के डीएम और एसपी को स्पष्ट निर्देश जारी करने को कहा गया है। आदेश के दौरान कहा गया है कि यदि कानून के ऐसे उल्लंघनों को नजरअंदाज किया गया, तो न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होगा। कानून का शासन सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रह सकता। बहरहाल, हाईकोर्ट के ताजा आदेश से भविष्य के लिए एक उम्मीद जरूर बंधी है।











