नई दिल्ली। बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court)ने बुधवार को चुनाव आयोग पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि वह आयोग द्वारा अपनाई गई SIR प्रक्रिया से “परेशान” है।जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियमों के प्रावधानों पर चुनाव आयोग से सवाल उठाते हुए जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने कहा: “SIR ने, चाहे किसी भी निर्देश के तहत हो, प्रभावी रूप से पूरी चुनावी व्यवस्था को निलंबित कर दिया है। यह धारा 22, नियम 21A और उन सभी नियमों को निलंबित करता है और कहता है कि सारे कानून भूल जाओ। अब तुम सॉफ्टवेयर को मानो। ऐसा नहीं हो सकता। इसका क्या स्पष्टीकरण है?
अदालत सांताक्रूज के एक परिवार के छह सदस्यों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने SIR के दौरान मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जाने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया था। निर्वाचन क्षेत्र के एक भाग से दूसरे भाग में पता बदलने के लिए फॉर्म 8 भरने के बावजूद उनके नाम हटा दिए गए थे।
पीठ ने कहा, “हमें अधिनियम में दिखाओ कि बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार कहाँ दिया गया है। अगर आप किसी का नाम हटाने की योजना बना रहे हो, तो पहले उस व्यक्ति को सुनवाई का मौका देना होगा।” अदालत ने संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को अदालत में उपस्थित रहने का भी निर्देश दिया।चुनाव आयोग की ओर से अधिवक्ता गौरीश अग्नि ने हाईकोर्ट को बताया कि SIR के दौरान सिस्टम ने फॉर्म 8 की प्रोसेसिंग की अनुमति नहीं दी, जिसके परिणामस्वरूप उनके नाम हटा दिए गए।
अदालत ने कहा, “हमारी समझ से, कानून हर समय काम करना चाहिए। ERO के पास सॉफ्टवेयर की चाबी होनी चाहिए—उसे कोड कहो या कुछ और—ताकि वह अपने आदेश के अनुसार सॉफ्टवेयर खोल सके, उसमें एंट्री कर सके या नाम हटा सके। यह किसी तीसरे व्यक्ति के पास नहीं हो सकती।” अदालत ने यह भी कहा कि ERO असहाय था और ERONET के आदेशों पर निर्भर था।
पीठ ने कहा कि तकनीक के बजाय अधिनियम का पालन होना चाहिए। “यह मतदाता के लिए काम करना चाहिए। आखिरकार, यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की भूमिका है कि कोई भी मतदाता छूट न जाए,” पीठ ने कहा।
अग्नि ने कहा कि SIR अवधि के दौरान फॉर्म 8 प्रोसेस नहीं किया जा सकता था और कोई बदलाव नहीं किए गए। अदालत ने कहा कि इसका मतलब अधिनियम और नियमों को स्थगित रखना है।“फिर आप कोई पूरी तरह अलग प्रक्रिया शुरू करके अधिनियम और नियमों को भी निलंबित कर रहे हो… इसका असर यह है कि आप अस्थायी रूप से कह रहे हो कि हम नियमों और अधिनियमों को दरकिनार कर रहे हैं… वे मौजूद ही नहीं हैं।
हम अपना काम करेंगे। हम इससे और इसके प्रभाव से बहुत परेशान हैं। यहाँ छह मतदाता हैं। हम सोच रहे हैं कि और कितने ऐसे हैं जो अदालत नहीं आए,” पीठ ने कहा।
अग्नि ने कहा कि कुछ मतदाताओं के नाम, जिन्हें हटाया गया था, फॉर्म 6 भरने के बाद शामिल कर लिए गए, और उन्होंने बताया कि परिवार ने गणना प्रपत्र जमा नहीं किए और फॉर्म 6 भरने से इनकार किया।
पीठ ने कहा, “आपको उनसे फॉर्म 6 भरवाने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि सिस्टम ने आपको फॉर्म 8 पर ऐसा करने की अनुमति ही नहीं दी। समस्या वही थी।”
“SIR, सबसे पहले, एक स्वतंत्र प्रक्रिया के रूप में फिट नहीं बैठता। SIR को मूल रूप से नियम 13 के साथ धारा 22 के तहत फिट होना होगा। आप जितने चाहो उतने पुनरीक्षण कर सकते हो, लेकिन अगर कोई पुनरीक्षण नहीं भी हो रहा हो, तो कोई भी नया मतदाता या जो एक वार्ड या भाग से दूसरे में जा रहा हो, फॉर्म 6, 7, 8 के तहत कभी भी प्रस्तुत कर सकता है। अधिनियम में कोई रोक नहीं है। हम बस इतना कह रहे हैं कि जब पुनरीक्षण आता है, तो वह इन प्रावधानों को ओवरराइड नहीं कर सकता,” पीठ ने कहा।
अग्नि ने कहा कि चुनाव आयोग का जानबूझकर किसी को हटाने का इरादा नहीं था। पीठ ने कहा, “आप बिना उस व्यक्ति की सुनवाई के किसी को नहीं हटा सकते। हमारी समझ से यही कानून है।”








