नेशनल ब्यूरो। तमिलनाडु के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में चौंका देने वाला मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने बाहरी दबाव का हवाला देते हुए कानून के छात्र से कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की आलोचना वाला अपना लेख वेब से हटा ले। यह लेख हाल ही में चर्चा में रहे NCERT पाठ्यपुस्तक विवाद से जुड़ा था, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय था। छात्र ने इस लेख को हटाने से साफ इंकार कर दिया है।
डेक्कन हेराल्ड ने लिखा है कि कानून के छात्र ऋषि ए. कुमार ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से लेख लिखने के बाद बढ़ते दबाव के बीच एक दूसरा लेख लिख डाला, जिसका शीर्षक था ‘ wrote about judicial corruption and overreach. And they called my university’ इसमें उन्होंने बताया कि कैसे न्यायाधीशों और वकील समुदाय के सदस्यों की शिकायतों के बाद विश्वविद्यालय ने हस्तक्षेप किया।
छात्र के अनुसार प्रशासन ने वकीलों और जजों से भारी दबाव का हवाला देते हुए लेख हटाने को कहा। छात्र ने लिखा, “मेरे विश्वविद्यालय ने झुकने का फैसला किया और मुझे तुरंत लेख हटाने के लिए ईमेल किया। मैंने इनकार कर दिया।”
लिख दिया भारत का सुप्रीमकोर्ट रीढ़विहीन
इस घटना ने शैक्षणिक स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार पर एक नई बहस छेड़ दी है। छात्र के मूल लेख जिस पर विवाद था उसका शीर्षक था ‘The Supreme Court of India has no spine’ यानि भारत का सुप्रीम कोर्ट रीढ़हीन है। इसमें शीर्ष अदालत के एनसीईआरटी कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले अध्याय पर स्वतः संज्ञान लेने का विश्लेषण किया गया था। यह अध्याय भारतीय कानूनी व्यवस्था की चुनौतियों जैसे लंबित मामलों का बोझ और न्यायिक अखंडता पर चर्चा करता था।
कोर्ट ने बताया था साजिश
नहीं भूला जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि विवादित अध्याय लिखने वाले तीन विशेषज्ञों को प्रतिबंधित करें। फरवरी में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मामले पर संज्ञान लिया। अदालत ने इस अध्याय को “सुनियोजित कदम” और “गहरी साजिश” करार दिया, जिसका मकसद संस्था को बदनाम करना था।
तीन विशेषज्ञों को किया था बैन
अदालत ने किताब की छपाई और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, स्कूलों और पुस्तकालयों से सभी भौतिक प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया और सरकार को अध्याय को फिर से लिखने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया।इसके बाद 11 मार्च को अदालत ने एक और आदेश जारी कर अध्याय लिखने वाले तीन विशेषज्ञों माइकल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और अलोक प्रसन्न कुमार को किसी भी सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित पाठ्यक्रम से जुड़े सभी कामों से प्रतिबंधित कर दिया।
प्रतिबंध को बताया असंवैधानिक
छात्र ने अपने लेख में तर्क दिया कि यह प्रतिबंध असंवैधानिक है और बिना सुनवाई के तीन लेखकों को ब्लैकलिस्ट करना न्यायिक प्रक्रिया की अस्वीकृति है। फॉलो-अप पोस्ट में उन्होंने कहा, “मैंने यह भी दिखाया कि भारत में न्यायिक भ्रष्टाचार जिससे अदालत इतनी नाराज हुई, एक अच्छी तरह से सार्वजनिक और वास्तविक समस्या है।”
छात्र ने पीएम की करी आलोचना
छात्र ने संस्थाओं की व्यापक विफलता पर भी तर्क दिया और प्रधानमंत्री तथा शिक्षा मंत्री की आलोचना की कि उन्होंने संविधान के प्रति अपनी शपथ का पूरी तरह उल्लंघन करते हुए इस प्रतिबंध का सार्वजनिक समर्थन किया। फॉलो-अप पोस्ट में छात्र ने बताया कि उनके लेख के व्यापक रूप से पढ़े जाने के बाद “सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों और वकीलों ने मेरे विश्वविद्यालय को फोन करना शुरू कर दिया और लेख हटवाने के लिए दबाव डाला।”उन्होंने विश्वविद्यालय से प्राप्त ईमेल भी पोस्ट किया, जिसमें उनसे “विश्वविद्यालय और आपके अपने हित में” लेख तुरंत हटाने को कहा गया था।
लेख न हटाने का ऐलान
छात्र ने विश्वविद्यालय को जवाब दिया है “मैं अपना लेख नहीं हटाऊंगा। न अब, न कभी।”उन्होंने कहा कि लेख उनके निजी सबस्टैक पेज पर पोस्ट किया गया था और इसे पूरी तरह व्यक्तिगत क्षमता में लिखा गया था। “मैंने कहीं भी इस विश्वविद्यालय के छात्र होने का जिक्र नहीं किया। मेरे विचार केवल मेरे हैं। इन्हें विश्वविद्यालय के विचारों से जोड़ने का कोई भी प्रयास स्पष्ट रूप से गलत है।”छात्र ने अधिकारियों से पूछा: “विश्वविद्यालय ऐसे बाहरी दबाव के आगे कैसे झुक सकता है?”











