रायपुर। छत्तीसगढ़ में वेदांता पॉवर प्लांट में हादसे के बाद 24 लोगों की मौत अब तक हो चुकी है। रविवार को रायगढ़ के फोर्टिस जिंदल अस्पताल में एक श्रमिक की मौत हो गई। इस हादसे की अब आयुक्त स्तर के अधिकारी ने भी जांच शुरू कर दी है। वहीं, दूसरी ओर इस केस में दर्ज एफआईआर को लेकर बहस भी तेज हो गई है।
एफआईआर में वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल को आरोपी बनाने के बाद उद्योगपति नवीन जिंदल (Naveen Jindal) ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर अनिल अग्रवाल के समर्थन में अपनी बात रखी है। इसके साथ ही देश की विकास की रीढ़ माने जाने वाले रेलवे और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) से मुनाफा कमाने वाल निजी उद्योगों की तुलना कर दी।
नवीन जिंदल ने अपने पोस्ट में हादसे को ‘बेहद दर्दनाक’ बताते हुए कहा कि प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, आजीविका सहायता और निष्पक्ष जांच मिलनी ही चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं में जिम्मेदारी तय करना जरूरी है, लेकिन बिना जांच के किसी बड़े उद्योगपति का नाम एफआईआर में शामिल करना गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस पर पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि ‘नवीन जिंदल अनिल अग्रवाल के पक्ष में खड़े हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई। सरकार तो साथ खड़ी है, जिंदल भी खड़े हो गए। भूपेश ने आगे कहा कि मजदूरों के जान की कोई कीमत नहीं है। उनको मुआवजा देने से काम चल जाएगा। क्या उन्हें न्याय नहीं मिलना चाहिए? दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?
अपने पोस्ट में नवीन जिंदल ने सवाल उठाया कि जब रेलवे या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में हादसे होते हैं, तो क्या वहां के चेयरमैन के खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज की जाती है? उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा नहीं होता, इसलिए निजी क्षेत्र के मामलों में भी समान मानक लागू होने चाहिए।
नवीन जिंदल का यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा इस बात को लेकर है कि जिंदल की यह तुलना न केवल असंगत है, बल्कि देश के सार्वजनिक संस्थानों की भूमिका और निजी उद्योगों की कार्यप्रणाली के बीच मूलभूत अंतर को भी नजरअंदाज करती है।
भारत में रेलवेऔर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) देश के विकास की रीढ़ माने जाते हैं। रेलवे ने न सिर्फ देश को जोड़ने का काम किया है, बल्कि करोड़ों लोगों को रोजगार, परिवहन और आर्थिक अवसर भी उपलब्ध कराए हैं। इसी तरह PSU ने ऊर्जा, स्टील, खनन, तेल और भारी उद्योगों में देश को आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई है।
इन संस्थानों में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए अपेक्षाकृत स्थायी नौकरी, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और सुरक्षा मानकों की बेहतर व्यवस्था मानी जाती है। सरकारी निगरानी और नियमों के कारण कार्यस्थल सुरक्षा पर भी अधिक ध्यान दिया जाता है।
इसके विपरीत निजी उद्योग मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं और उत्पादन से लेकर मेंटेनेंस तक का बड़ा हिस्सा ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) पर दे देते हैं। इससे श्रमिकों की सुरक्षा, प्रशिक्षण और जवाबदेही कमजोर हो जाती है।
आरोप यह भी है कि कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम के कारण मजदूरों को स्थायी सामाजिक सुरक्षा, बीमा और लाभ नहीं मिल पाते, जबकि काम का जोखिम वही उठाते हैं। लागत कम करने के लिए कंपनियां कई बार सुरक्षा मानकों को लेकर समझौता करती हैं, जिससे हादसों का खतरा बढ़ जाता है।
नवीन जिंदल के बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के हादसों की जिम्मेदारी तय करने का एक ही पैमाना होना चाहिए या दोनों की प्रकृति और संरचना अलग होने के कारण अलग मानक लागू होने चाहिए।
वेदांता हादसे को लेकर जहां एक ओर जांच और जवाबदेही की मांग तेज है, वहीं दूसरी ओर उद्योग जगत और नीति निर्माताओं के बीच यह बहस भी गहराती जा रही है कि औद्योगिक सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों को किस तरह मजबूत किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
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