मनोज झा, राज्यसभा सदस्य
लोकतंत्र में मौसम बदलते देर नहीं लगती। पहले मानसून आता था, फिर चुनाव आते थे, और अब एक तीसरा मौसम स्थायी रूप से स्थापित हो चुका है—जिसे राजनीतिक भूगोल के जानकार बड़ी गंभीरता से “पुनर्संयोजन” कहते हैं और जनता, जो अब भी पुरानी भाषा में जीती है, उसे सीधा ‘जनादेश की अदला-बदली’ कहती है। फर्क बस इतना है कि जनता को चीजें सीधे समझ में आ जाती हैं, इसलिए उसे थोड़ा गैर-वैज्ञानिक मान लिया गया है।
यह नया मौसम इतना नियमित हो गया है कि अब इसे आपदाओं की सूची में नहीं रखा जाता, बल्कि प्रबंधन कौशल में रखा जाता है। पहले नेता दल बदलते थे, अब दल ही नेता बदलने लगे हैं। पार्टी अब विचारधारा नहीं रही, एक “लचीला कंटेनर” है जिसमें जो चाहे, जब चाहे, रखा और निकाला जा सकता है।
कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र अब चुनाव नहीं, एक “स्थानांतरण उद्योग” है। यहां माल भी तैयार है, पैकिंग भी सुचारु है और डिलीवरी भी समय पर होती है। फर्क बस इतना है कि पार्सल पर “डिलीवरी चार्ज” नहीं लिखा होता, उसे “राजनीतिक स्थिरता शुल्क” कहा जाता है। कुछ पुराने भोले लोग अभी भी इसे दल-बदल कहते हैं। जैसे वे अभी भी बारिश को बारिश और भूख को भूख कहते हैं। पर आधुनिक लोकतांत्रिक शब्दावली में यह सब बड़ा पिछड़ा हुआ लगता है। अब यह “जनादेश पुनर्वितरण योजना” है—एक ऐसी योजना जिसमें मतदाता को केवल एक बार उपयोग होने वाली इकाई माना जाता है।
मतदाता ने बड़ी मासूमियत से वोट दिया था। उसने सोचा था कि वह विचारधारा चुन रहा है, शायद कोई वादा, कोई दिशा, कोई भविष्य। लेकिन उसे बाद में समझाया गया कि वह भ्रम में था। उसने दरअसल केवल एक “प्रवेश-पत्र” दिया था, विचारधारा तो बाद में अपडेट होने वाला ऐप है। और ऐप की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसका अपडेट उपयोगकर्ता की अनुमति से नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय हित” में होता है। उपयोगकर्ता यानी मतदाता को बस सूचना मिलती है—“आपका जनादेश बेहतर अनुभव के लिए अपग्रेड कर दिया गया है।” अब मतदाता यह तय नहीं करता कि उसने क्या चुना है, उसे बस यह बताया जाता है कि वो शायद भूल गया है कि उसने क्या “चुनने का इरादा किया था।”
राज्यसभा से शुरू हुआ यह खेल अब बंगाल की गलियों से होता हुआ महाराष्ट्र की राजनीतिक चौपाल तक पहुँच चुका है। हर जगह दृश्य एक जैसा है, थोड़ा-सा आश्चर्य, थोड़ा-सा औपचारिक दुख, और उसके तुरंत बाद “राजनीतिक परिपक्वता” का बयान। राजनीति में दुख भी अब भावनात्मक नहीं रहा, वह एक प्रेस विज्ञप्ति बन चुका है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में नैतिकता का उल्लेख उसी तरह किया जाता है जैसे पुराने भाषणों में ईमानदारी का—जरूरत पड़ने पर, और वह भी बेहद हल्की आवाज़ में, ताकि कहीं असुविधा न हो।
कहने को यह सब लोकतंत्र के भीतर हो रहा है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही बताई जाती है कि उसमें सब कुछ संभव है यहाँ तक कि लोकतंत्र का अर्थ बदल देना भी। इसलिए यदि जनादेश एक पार्टी से दूसरी पार्टी में चला जाए, तो उसे “स्थिरता” कहा जाता है। यदि विचारधारा पलट जाए, तो उसे “व्यावहारिकता” कहा जाता है।
और यदि जनता पूछ बैठे कि यह सब कैसे हो रहा है, तो उसे समझाया जाता है कि वह “प्रक्रिया” को नहीं समझती। लोकतंत्र अब इतना जटिल हो गया है कि उसमें सरल प्रश्न पूछना भी एक प्रकार की अशिष्टता माना जाने लगा है। टीवी चैनलों पर इस प्रक्रिया का विश्लेषण उसी गंभीरता से होता है जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय युद्ध का। फर्क बस इतना है कि युद्ध में नुकसान स्पष्ट होता है, यहां लाभ अस्पष्ट होता है, लेकिन आशा हमेशा जीवित रखी जाती है कि “कुछ तो अच्छा हो रहा होगा।”
इस बीच मतदाता धीरे-धीरे एक पुराना उपकरण बनता जा रहा है—ऐसा उपकरण जिसे लोकतंत्र के शोकेस में रखा तो गया है, लेकिन उपयोग केवल औपचारिक अवसरों पर होता है। वह हर पाँच साल में सक्रिय किया जाता है, फिर सम्मानपूर्वक बंद कर दिया जाता है। उसने यह सोचा था कि वह किसी नीति, किसी दृष्टि, किसी विचार को शक्ति दे रहा है। अब उसे बताया जाता है कि उसने केवल एक व्यक्ति को चुना था, और व्यक्ति अब “अपग्रेडेबल यूनिट” है। विचारधारा? वह तो मौसम की तरह है……….जहां हवा चले, वहाँ बदल जाती है।
और जब यह सब होता है, तो उसे लोकतांत्रिक लचीलापन कहा जाता है। लचीलापन इतना अधिक है कि अब रीढ़ की हड्डी भी केवल प्रतीकात्मक रह गई है। लोकतंत्र का ढांचा जस का तस है—चुनाव आयोग, मतदान केंद्र, ईवीएम, शपथ ग्रहण—सब कुछ विधिवत चलता है। केवल भीतर की सामग्री बदलती रहती है, जैसे पुरानी बोतल में नया लेबल लगा दिया जाए और कहा जाए कि पेय वही है, बस स्वाद “अधिक परिष्कृत” हो गया है।
सबसे रोचक बात यह है कि इस पूरे परिवर्तन को संकट नहीं कहा जाता। संकट तो वह होता है जिसमें प्रश्न उठें। यहाँ प्रश्न उठते ही उन्हें “राजनीतिक अपरिपक्वता” कहकर वापस बैठा दिया जाता है। जो चीज जितनी तेजी से सामान्य हो जाए, वह उतनी ही अधिक स्वीकार्य मानी जाती है।धीरे-धीरे लोकतंत्र एक ऐसे कारोबार में बदल जाता है जहाँ जनता की भूमिका केवल उपभोक्ता की रह जाती है, और वह भी ऐसा उपभोक्ता जिसे यह भी तय नहीं करने दिया जाता कि वह क्या खरीद रहा है। उसे बस बिल समय पर भरना है और हर बार आभारी रहना है कि उसे विकल्प दिए गए हैं।
डेमोस कहीं पीछे छूट जाता है, भाषणों में, नारों में, प्रस्तावनाओं में। क्रेसी, यानी सत्ता, आगे बढ़ती रहती है; अपने विस्तार, अपने समीकरण और अपने “व्यवहारिक गठबंधनों” के साथ। और तब लोकतंत्र एक ऐसे मंच पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ सब कुछ मौजूद है मसलन लाइट, कैमरा, स्क्रिप्ट—लेकिन कहानी में दर्शक धीरे-धीरे गायब हो चुका है। अंत में बस एक धीमी-सी आवाज बचती है, जो अब नारे में नहीं बदलती, न टीवी डिबेट में जगह पाती है। वह बस पूछती है“यदि जनादेश बार-बार बदला जा सकता है, तो फिर चुनाव किसका हुआ था?”
जय हिन्द
- मनोज झा के एक्स पोस्ट से साभार










