ममता के आरोपों से चुनाव आयोग की साख पर सवाल

Mamata Banerjee

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भले ही भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार भारी जीत हासिल कर ली है, लेकिन उसकी जीत निष्कलुष नहीं कही जा सकती, जिसे लेकर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने गंभीर सवाल उठाए हैं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

हालत यह हो गई है कि ममता बनर्जी ने नैतिक जीत का दावा करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देने का ऐलान कर दिया है। हालांकि नई सरकार के गठन में किसी तरह की संवैधानिक बाधा नहीं आएगी, क्योंकि छह मई को पिछली विधानसभा भंग हो जाएगी।

मगर सवाल इससे बड़े हैं और इनका जवाब चुनाव आयोग को देना ही चाहिए, क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र की साख का सवाल है।

यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि पश्चिम बंगाल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने शुरू से मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जिस तरह का मनमाना रुख अपनाया था, उसकी परिणति सुप्रीम कोर्ट के दखल तक देखी गई थी। दुखद यह है कि पश्चिम बंगाल के लाखों मतदाताओं को सुप्रीम कोर्ट तक से राहत नहीं मिली।

ऐसा लग रहा था कि मानो चुनाव आयोग ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल सरकार को अपना प्रतिद्वंद्वी मान रहा हो। वास्तविकता तो यही है कि एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से तथ्यों के साथ चुनाव आयोग को घेरा था उसका जवाब देना तक आयोग ने जरूरी नहीं समझा था।

पश्चिम बंगाल में जिस तरह से चुनाव हुए हैं और इसमें जिस तरह से संस्थागत तरीके से भाजपा को लाभ पहुंचाया गया, उसके सीधे प्रमाण देना भले ही मुश्किल हो, भारतीय लोकतंत्र के क्षऱण को साफ देखा जा सकता है।

ममता बनर्जी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में अपनी पार्टी की हार के लिए सीधे सीधे चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे ‘विलेन’ बताया है। ममता ने चुनाव आयोग के साथ ही सीआरपीएफ और केंद्र सरकार पर आरोपों को झड़ी लगा दी और प्रधानमंत्री मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह तक को घेरा है। यहां तक कि मीडिया की भूमिका को लेकर भी उन्होंने गंभीर आरोप लगाए हैं।

ममता ने कहा, ‘जब ज्यूडशयरी वहां नहीं है, इलेक्शन कमीशन पक्षपाती हो, जब भारत सरकार सिर्फ एक पार्टी का शासन चाहती हो, तब लोगों को न्याय कैसे मिलेगा।‘ उनके इन शब्दों को सिर्फ हार की उनकी खिसियाहट कह कर खारिज नहीं किया सकता।

ममता बनर्जी ने कहा है कि जब मुश्किल से मतगणना का पहला दौर पूरा नहीं हुआ था कि मीडिया में यह प्रचारित किया गया कि भाजपा को राज्य में 190 से 200 सीटें मिल रही हैं और उसके बाद भाजपा उम्मीदवार और सीआरपीएफ के सैकड़ों जवान काउंटिंस सेंटरों में घुस गए और उनकी पार्टी के एजेंटों के साथ मारपीट कर उन्हें बाहर निकाल दिया।

यह तो सबने देखा कि किस तरह से चुनावों की घोषणा के बाद पश्चिम बंगाल में नीचे से लेकर ऊपर तक सारे अधिकारी बदल दिए गए। यही नहीं, पूरे प्रदेश में करीब ढाई लाख जवानों की तैनाती की गई थी, जैसा पहले कभी नहीं हुआ।

और अब यदि केंद्र मंत्री रहीं और राज्य में पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री रहीं वरिष्ठ नेता ममता यह आरोप लगा रही हैं कि सीआरपीएफ के जवानों और भाजपा उम्मीदवार और कार्यकर्ताओं ने उन्हें काउंटिंग सेंटर में घुसने नहीं दिया और उनके साथ मारपीट की, तो यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया को संदेह के घेरे में डाल देता है।

बेशक जिन 27 लाख वोटरों के नाम काटे गए, यह जरूरी नहीं कि वे सबके सब तृणमूल को ही वोट देते, लेकिन इस तथ्य को कैसे नकारा जा सकता है कि एसआईआर के तहत 25 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम कटने वाली जिन 112 सीटों में 2021 में तृणमूल को 86 सीटें मिली थीं, वहां इस बार भाजपा को 72 सीटें मिल गई हैं और इनमें ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट भी शामिल है!

हमने यहां कल भी लिखा था कि ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ तमाम मुद्दे थे और उन्हें हराने की और भी वजहें हो सकती थीं। इंडिया गठबंधन को लेकर खुद ममता बनर्जी का जैसा रुख रहा है, उसने भी विपक्ष की राजनीति को नुकसान पहुंचाया था। मगर इस हार के बाद लगता है कि ममता बनर्जी को अपनी गलती का एहसास हो गया है और इसलिए उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में न केवल इंडिया गठबंधन के नेताओं के समर्थन की बात की, बल्कि साफ संकेत दिए हैं कि पश्चिम बंगाल की लड़ाई सिर्फ तृणमूल की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसमें इंडिया गठबंधन भी साथ है।

गौर किया जा सकता है कि खुद राहुल गांधी ने ममता बनर्जी के सौ सीटों की लूट के आरोप से न केवल सहमति जताई है, बल्कि तृणमूल की हार का जश्न मना रहे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को आगाह भी किया है। सिर्फ राहुल और सोनिया गांधी ही नहीं, बल्कि इंडिया गठबंधन के अखिलेश यादव, हेमंत सोरेन, तेजस्वी, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं ने ममता बनर्जी के साथ एकजुटता दिखाई है।

ऐसे में यह देखना होगा कि क्या पश्चिम बंगाल, जहां भाजपा ने अभी अभी अपना भगवा परचम लहराया है, क्या इंडिया गठबंधन का नया प्रस्थान बिंदु बनेगा।

यह भी पढ़ें: लोकतंत्र का बदलता चेहरा और चुनावी हकीकत

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now