एक रुकी हुई संसद में एकालाप

February 6, 2026 12:28 PM
Editorial

फणिश्वरनाथ रेणु की कहानी रसप्रिया में कहानी के एक पात्र शोभा मिसिर का बेटा एक अन्य पात्र मिरदंगिया से पूछता है, ‘मिरदंगिया तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो….।‘ संसद का आज यही हाल हो गया है। लगता है, जिन पर उसे चलाने की जिम्मेदारी है, वे उसे चला नहीं रहे हैं, थेथरई कर रहे हैं!

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषण से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुआ टकराव यदि इस अप्रिय स्थिति तक पहुंच गया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को यह कहना पड़ा कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया कि वे सदन में ना आएं, क्योंकि अप्रिय घटना घट सकती है, तो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी खुद ओम बिरला की ही थी, कि वे सदन को समभाव से चला न सके।

बजट पेश किए जाने के बाद से खासतौर से लोकसभा में अभूतपूर्व स्थिति बन गई है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कोई सुलह का रास्ता नजर नहीं आया, बल्कि लगता तो ऐसा भी है कि इसके समुचित प्रयास नहीं किए गए। हालात यहां तक पहुंच गई कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषण के बिना इसे पारित कर दिया गया।

हम यहां लिख चुके हैं कि पूर्व रक्षा मंत्री एम एम नरवणे की जिस चर्चित किताब के कारवान पत्रिका में प्रकाशित अंशों को राहुल को सदन के भीतर पढ़ने से रोका गया, वह लंबे समय से सार्वजनिक हैं। दरअसल सवाल यह भी है कि यदि लोकसभा अध्यक्ष किसी किताब या पत्रिका में प्रकाशित सामग्री का जिक्र न करने से रोकने की व्यवस्था बनाई थी, तो फिर भाजपा के निशिकांत दुबे कैसे सदन में न केवल एक ऐसी किताब को लेकर हमलावर थे, जिसके एक अध्याय पर रोक लगी हुई है, बल्कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पर ऐसे आरोप लगाए, जिसका जवाब देने के लिए वे उपस्थित नहीं हो सकते।

दरअसल एक स्वस्थ लोकतंत्र में किताबें और पत्रिकाओं के जिक्र करने से नहीं बचना चाहिए। बल्कि संसद तो विमर्श की जगह ही है। संसद को सुचारू रूप से चलाने में सत्ता पक्ष और विपक्ष के साथ ही लोकसभा अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी होती है।

मगर लगता है कि मोदी सरकार ने फ्लोर प्रबंधन के नियम ही उलट पुलट दिए हैं और वे सदन के भीतर भी विपक्ष को चुनावी मैदान के दुश्मन समझती है। वरना याद किया जा सकता है कि वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली एनडीए सरकार में जॉर्ज फर्नांडीज से लेकर प्रमोद महाजन तक कैसे विपक्ष के नेताओं के साथ सुलह का कोई न कोई रास्ता निकालते थे। इस क्रम में दिवंगत अरुण जेटली का भी नाम लिया जा सकता है, बावजूद इसके कि मोदी के कार्यकाल के दौरान इस मामले में उनका प्रदर्शन कोई अच्छा नहीं था।

याद तो यह भी किया जा सकता है कि यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को घेरकर किस तरह से भाजपा के सांसदों ने प्रदर्शन किए थे।

देश की संसद पूरे देश की प्रतिनिधि है, और इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। निश्चित रूप से मंगलवार को सदन के भीतर प्रधानमंत्री की चेयर के पास विपक्ष के सदस्यों ने काफी हंगामा किया था। उनके हाथों में बैनर भी थे। इनमें महिला सांसद भी आगे थीं।

बुधवार को सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के महज 65 सेकंड में लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने सदन को स्थगित कर दिया। उसके बाद तीसरी बार तीन बजे सदन की कार्यवाही शुरू होने पर उन्होंने यह कहते हुए स्तब्ध कर दिया कि, “मुझे सूचना मिली थी कि विपक्ष के कई सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच सकते हैं, जिससे कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी। इसलिए मैंने पीएम को सदन में नहीं आने का आग्रह किया।”

वाकई यह लोकतंत्र का न्यूनतम क्षण है, जब चुनी हुई संसद के भीतर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता भाषण न दे सके। प्रधानमंत्री मोदी को सदन में न बुलाकर वास्तव में लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने प्रधानमंत्री पद को दयनीय बना दिया!

सवाल तो यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा अध्यक्ष के ऐसे अतार्किक सुझाव को क्यों स्वीकार किया? आखिर उन्होंने चुनी हुई लोकसभा का सामना कर वहां से पूरे देश को संदेश देना क्यों नहीं जरूरी समझा?

बेशक प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब लोकसभा के बजाए विपक्ष के बॉयकॉट के बीच राज्यसभा में दिया। मैदान खाली था और उनका भाषण एक रुकी हुई संसद में एकालाप जैसा ही था। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने जो सवाल उठाए थे, उनके जवाब नहीं मिले।

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