Kunal Shukla v. Himayani Puri: रायपुर के सोशल एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हिमायनी पुरी से जुड़े मानहानि मुकदमे में लगाई गई रोक को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की है। इस रोक आदेश में उन्हें और अन्य लोगों को सोशल मीडिया पोस्ट्स हटाने का निर्देश दिया गया था जिनमें हिमायनी पुरी को अमेरिकी फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन (बच्चों के यौन शोषण के दोषी) से जोड़ा गया था। दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर) सोमवार को इस अपील की सुनवाई करेगी।
क्या है पूरा मामला?
हिमायनी पुरी ने 10 करोड़ रुपये के मानहानि मुकदमे में दावा किया कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। इसमें उन्हें एपस्टीन और उनकी आपराधिक गतिविधियों से जोड़कर गलत जानकारी फैलाई जा रही है जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है।17 मार्च 2026 को सिंगल जज जस्टिस मिनी पुष्करना ने एक अंतरिम आदेश जारी किया। इसमें X, गूगल, यूट्यूब, मेटा, लिंक्डइन समेत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अज्ञात संस्थाओं को भारत में ऐसी सामग्री हटाने का निर्देश दिया गया। अदालत ने फिलहाल वैश्विक स्तर पर हटाने (ग्लोबल टेकडाउन) पर विचार नहीं किया और इसे बाद की सुनवाई के लिए रखा।
एक्टिविस्ट का तर्क
कुणाल शुक्ला ने अपनी अपील में इस रोक आदेश को मुकदमे से पहले का एकतरफा गैग ऑर्डर बताया है। उनके अनुसार ‘उन्होंने जो पोस्ट्स और सामग्री शेयर की, वह पूरी तरह सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित थी। इनमें अमेरिकी SEC फाइलिंग्स, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और आधिकारिक रूप से जारी सामग्री शामिल हैं। सिंगल जज ने बिना नोटिस दिए और बिना उनकी दलील सुनने के ही रोक आदेश जारी कर दिया, जो शुरुआती चरण में ही फैसला सुनाने जैसा है।
मानहानि के मामलों में जब प्रतिवादी सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर सच्चाई, औचित्य या निष्पक्ष टिप्पणी का बचाव पेश कर रहा हो, तो मुकदमे से पहले रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। यह सामग्री सार्वजनिक महत्व के सवाल उठाती है, जैसे सार्वजनिक पदों वाले लोगों के वित्तीय संबंध और लेन-देन।’
शुक्ला का कहना है कि ‘विवादित सामग्री न तो झूठी है और न ही दुर्भावनापूर्ण। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता के दायरे में आती है। उन्होंने दलील दी कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अधिकार पर ‘पूर्व-प्रतिबंध’ लगाता है और खोजी रिपोर्टिंग पर ठंडा प्रभाव (डालता है। अपील में यह भी कहा गया कि अदालत ने बिना यह देखे कि क्या कोई कम सख्त उपाय पर्याप्त होगा सीधे व्यापक हटाने का आदेश दे दिया।’
मुकदमे में कौन-कौन शामिल?
मुकदमे में 1 से 14 तक नामित प्रतिवादी पत्रकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, 15 से 18 तक सरकारी अधिकारी और बाकी अज्ञात प्रतिवादी हैं। हिमायनी पुरी ने दावा किया कि विवादित सामग्री अभी भी ऑनलाइन उपलब्ध है और उनकी प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुंचा रही है। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानहानि के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, खासकर तब जब सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित सामग्री को लेकर विवाद हो।
यह अपील वकीलों मयंक जैन, मधुर जैन और अर्पित गोयल के माध्यम से दायर की गई। बता दें, 17 मार्च को सिंगल जज ने ट्विटर, गूगल, यूट्यूब, मेटा और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और अन्य ‘जॉन डो’ (अज्ञात) संस्थाओं को कैबिनेट मंत्री की बेटी के खिलाफ कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश दिया था। हालांकि, जज ने स्पष्ट किया कि फिलहाल अदालत केवल भारत के भीतर सामग्री को हटाने पर विचार करेगी, क्योंकि ‘वैश्विक रूप से हटाने’ (Global Takedown) का पहलू हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष लंबित है। हिमानी पुरी ने 10 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया था, जिसमें सामग्री को हटाने के लिए ‘जॉन डो’ आदेश की मांग की गई।









