शरजील इमाम ने जेल से इंटरव्यू में ऐसा क्या लिख दिया जिसपर बवाल है

नई दिल्ली। शरजील इमाम का जेल (Jail) से लिखित इंटरव्यू चर्चा में है। जामिया मिलिया इस्लामिया की दीवारों पर शुक्रवार शाम लिख दिया कि फ्री कश्मीर, फ्री शरजील, उधर सुप्रीम कोर्ट से रियार्टेड जज उनकी रिहाई की बातें कह रहे हैं। द क्विंट को दिए गए इंटरव्यू में शरजील ने धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, संविधान और भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति पर अपने विचार रखे। द क्विंट के मुताबिक, तिहाड़ जेल से लिखे जवाबों में उन्होंने अपनी विचारधारा और जेल की जिंदगी बताई।

आमतौर पर जेल में कैमरा, रिकॉर्डर या आमने-सामने इंटरव्यू की अनुमति नहीं होती। शरजील इमाम जैसे मामले में यह और भी दुर्लभ था। फिर भी द क्विंट ने बिना कैमरे या माइक के इंटरव्यू किया। यह पूरी तरह लिखित हुआ। रिपोर्टर के सवाल कागज पर पहुंचाए गए और शरजील ने तिहाड़ जेल से लिखकर जवाब भेजे। इन्हीं जवाबों को कई लोग “इस्लामिस्ट मैनिफेस्टो” बता रहे हैं। काई लोग कह रहे हैं कि क्या ऐसा इंटरव्यू करने की इजाजत उमर खालिद या संजीव भट्ट को दी जाएगी?

2020 में गिरफ्तारी के बाद शरजील को बोलते कम सुना गया। पहली बार उन्होंने अपने विचार और आइडियोलॉजी इतनी साफ रखी। जवाबों में तीखापन है। उन्होंने लिखा कि “सेक्युलर कन्सेंसस” भारतीय मुसलमानों के लिए एक जाल और झूठ है, जो सिर्फ अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने की प्रक्रिया को मजबूत करता है।

उन्होंने संविधान को फासीवादी कहा, धर्मनिरपेक्षता को जाल बताया और लोकतंत्र को मुसलमानों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने का तरीका बताया। साथ ही कहा कि मुसलमान बाकी चीजों से पहले सबसे पहले भारतीय हैं। इस इंटरव्यू से वे फिर चर्चा में आ गए। सरकार और बीजेपी की नजर में वे देशद्रोही हैं, जबकि उनके खिलाफ रहने वालों में से कई के लिए हीरो हैं।

शरजील इमाम ने इस इंटरव्यू में धर्मनिरपेक्षता को खारिज किया। उसने सेक्युलर फ्रेमवर्क के विषय में लिखा है कि यह हिन्दुत्व फ्रेमवर्क है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई, द्रविड, आदिवासी और दलित एवं किसी भी वंचित वर्ग का कोई स्थान नहीं है और सबसे बढ़कर शरजील ने लिखा कि इसका मूल एक है कि और वह है ‘एक प्राचीन भारत के अस्तित्व का मिथक, जो एक था और यहां तक कि जो भी बाहरी आए, वह इसमें आत्मसात हो गए।’ शरजील इमाम ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भी आलोचना इस इंटरव्यू में की है।

क्या लिखा है?
जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक “भारत एक खोज” की आलोचना करते हुए शरजील इमाम का कहना है कि इस झूठ कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है, को बताने का सबसे बड़ा उदाहरण जवाहर लाल नेहरू की लिखी पुस्तक है। मौलाना आजाद का शोध जहां इस बात को नकारता है कि भारत का कभी विचार भी था या भारत में कभी एकता भी थी, और इकबाल और जिन्ना ने भी भारतीय राष्ट्र के विचार को नकारा है तो वहीं इन सबका यही मानना है कि यह उपमहाद्वीप अभी भी राष्ट्र नहीं बना है और भारत के मुसलमान आधुनिक अर्थ में एक राष्ट्र कहे जा सकते हैं।

इसका अर्थ यह है कि शरजील इमाम भारत के प्राचीन अस्तित्व से ही इनकार करता है और जवाहर लाल नेहरू को भी झूठा ठहराने से नहीं हिचकता। उसके अनुसार भारत का जो सेक्युलर ढांचा है, वह सभी भारतीयों को एक मानता है और सभी शैक्षणिक और राजनीतिक विकास इस तरह से किए जाते हैं कि सभी केवल भारतीय हैं और कोई नहीं।

शरजील का मानना है कि ऐसा करके अर्थात भारतीय घोषित करके अल्पसंख्यकों या फिर अन्य वंचित समूहों का दमन किया जाता है। उसके अनुसार यदि धार्मिक अल्पसंख्यक या आदिवासी स्वायत्ता या अपने समुदाय के लिए भूमि का अधिकार मांगते हैं, तो उन्हें “सांप्रदायिक” या “विभाजन करने वाला कहा जाता है?”

शरजील ने जेल से क्या-कुछ बताया?
वे तिहाड़ में दो बिल्लियों चू और लीसा के साथ अपनी किताबों और अधूरे पीएचडी शोध के साथ समय बिता रहे हैं। इन बिल्लियों को वे रिहाई के बाद घर ले जाना चाहते हैं। जेल में सैकड़ों अनपढ़ या गरीब कैदी अपनी चार्जशीट लेकर उनके पास आते हैं। आईआईटी बॉम्बे के इस पूर्व छात्र उनकी चार्जशीट पढ़ते हैं, केस समझाते हैं और कानूनी सलाह देते हैं।

क्यों जेल में बंद हैं?
शरजील इमाम और उमर खालिद सीएए विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों से जुड़े केस में जनवरी 2020 से जेल में हैं। 2200+ दिनों से बिना ट्रायल विचाराधीन कैदी के रूप में हैं। शरजील को 28 जनवरी 2020 को गिरफ्तार किया गया, उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को। उन पर दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मास्टरमाइंड होने का आरोप है।

FIR 59 के तहत सख्त यूएपीए मामले में जमानत याचिकाएं निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक कई बार खारिज हो चुकी हैं। 5 सह-आरोपी जमानत पर रिहा हो चुके हैं। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस सुधांशु धुलिया ने कहा कि उन्हें बहुत पहले जमानत मिल जानी चाहिए थी, क्योंकि बिना दोष साबित किए इतने लंबे समय तक अंडरट्रायल रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कौन हैं शरजील इमाम?
वे बिहार के जहानाबाद जिले के काको गांव में 1988 में जन्मे। पिता अकबर इमाम नेता थे, 2005 में जेडीयू के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े और 2014 में कैंसर से निधन हो गया। बचपन आराम से बीता। पटना के सेंट जेवियर हाई स्कूल और दिल्ली के डीपीएस वसंत कुंज से पढ़ाई की।

आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री ली। बाद में बेंगलुरु की सॉफ्टवेयर कंपनी और डेनमार्क के कोपेनहेगन में प्रोग्रामर की नौकरी की। फिर सब छोड़कर 2013 में जेएनयू में मॉडर्न हिस्ट्री में मास्टर्स किया और 2015 से विभाजन व मुस्लिम राजनीति पर पीएचडी रिसर्च करने लगे।

चर्चा कैसे शुरू हुई?
2020 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिए भाषण से चर्चा शुरू हुई। उसमें कथित रूप से कहा गया था: “अगर हम 5 लाख लोग संगठित हो जाएं तो हिंदुस्तान और असम को हमेशा के लिए अलग कर सकते हैं।असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।” इसे देश की अखंडता पर हमला माना गया। कई राज्यों में देशद्रोह और यूएपीए के मामले दर्ज हुए। 28 जनवरी 2020 को उन्होंने अपने गांव काको में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया।

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