जानें मुठभेड़ में ढेर हुए बसवराजु को, जो 8 साल से माओवादियों को कर रहा था लीड, हर बड़ी नक्सली वारदात का मास्टरमाइंड

May 22, 2025 3:22 AM
Basavaraju

रायपुर। अबूझमाड़ में फोर्स और नक्सली मुठभेड़ में मारा गया बसवराजु अभी माओवादियों का सबसे बड़ा नेता था। वह सीपीआई (माओवादी) का राष्ट्रीय महासचिव था। बसवराजु (Basavaraju) का नाम नम्बाला केशव राव है, जिसे गगन्ना के नाम से भी जाना जाता है। नम्बाला का नाम भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA की फरार लोगों की सूची में ऊपर ही रहा है। वह सीपीआई (माओवादी) के केंद्रीय सैन्य आयोग का प्रमुख भी रह चुका था।

नवंबर 2018 में मुपल्ला लक्ष्मणराव (उर्फ गणपति) के बीमार होने के बाद गणपति की ही सिफारिश से उसे पार्टी का शीर्ष पद, राष्ट्रीय महासचिव सौंपा गया था। इंटरनेट पर मौजूद सूचनाओं के मुताबिक वह 2017 से ही अपनी पार्टी का नेतृत्व संभाल रहा था।

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बसवराजू को आज तक, युवा आंदोलन के दौर में, केवल एक बार एबीवीपी के साथ गुटीय संघर्ष में गिरफ्तार किया गया था। इसके महासचिव का पद संभालने के बाद यह कहा जा रहा था कि सीपीआई माओवादी सैन्य नजरिए से अधिक संगठित और आक्रामक हुई। बसवराजु विस्फोटकों का एक्सपर्ट माना जाता रहा है। उसकी मौत की खबर ने आज देशभर में सशस्त्र माओवादियों और उनके समर्थकों में हड़कंप मचा दिया।

बसवराजु उर्फ केशव राव का जन्म आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम इलाके में जुलाई 1955 में हुआ था। बसवराजू ने वारंगल के रीजनल इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था। बीटेक की पढ़ाई के दौरान ही लेफ्ट पार्टीज में सक्रियता शुरू की। एबीवीपी के कुछ सदस्यों से टकराव के बाद उसे 1980 में गिरफ्तार किया गया था।

ऐसा माना जाता है कि पिछले करीब एक डेढ़ दशक में छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्रप्रदेश-तेलंगाना, महाराष्ट्र के हर बड़े हमले की प्लानिंग, जिनमें बड़ी तादाद में सशस्त्र बल के जवानों की जानें गईं, बसवराजु ने ही की थी। संगठन का राष्ट्रीय महासचिव बनने से पहले ये सीपीआई (एमएल) की सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का हेड था।

सीपीआई(माओवादी) की सैन्य रणनीति का आक्रामक योजनाकार के रूप में जाने जाने वाला बसवराजु इस दौरान पीपल्स लिब्ररेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) को बढ़ाने में लगा था। इसी वजह से बीते 8 वर्षों से सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था। वह वैचारिक रूप से भी मजबूत माना जाता रहा है। यह भी कहा जाता है कि राव को लिट्टे से भी ट्रेनिंग मिली थी। हालांकि माओवादी हमेशा ही लिट्टे से ऐसे सैन्य संबंधों से इनकार करते रहे हैं।

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