Ken-Betwa Link Project : मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ चल रहे आदिवासी और किसानों के आंदोलन ने अब निर्णायक रूप ले लिया है। 11 दिनों से जारी इस प्रदर्शन में बुधवार को पंचतत्व सत्याग्रह के तहत हुए भावुक और आक्रामक प्रदर्शन ने प्रशासन को वार्ता की मेज पर ला खड़ा किया।आंदोलनकारियों ने जल, मिट्टी, अग्नि (चिता), वायु और उपवास के पांच तत्वों के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराया। केन नदी में खड़े होकर जल सत्याग्रह, जमीन पर मिट्टी सत्याग्रह, सांकेतिक चिता पर लेटकर प्रदर्शन और पूरे गांव में चूल्हा बंद रखकर भूख हड़ताल की गई। सबसे मार्मिक दृश्य तब देखने को मिला जब पांच आंदोलनकारियों ने सांकेतिक फांसी लगाकर चेतावनी दी। इस घटना के बाद स्थानीय अधिकारियों को तुरंत बातचीत शुरू करनी पड़ी।
प्रशासन ने मानी प्रमुख मांगें
लंबी बैठक के बाद छतरपुर और पन्ना के वरिष्ठ अधिकारियों ने आंदोलनकारियों की कई अहम मांगों पर सहमति जताई।
प्रभावित गांवों का पूरी तरह पारदर्शी और नए सिरे से सर्वेक्षण होगा।
हर गांव में एसडीएम या डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी सर्वे करेंगे।
सर्वे का काम 7 दिनों में पूरा करने का आश्वासन।
बिजावर एसडीएम का हस्तक्षेप समाप्त कर बाहरी अधिकारियों की तैनाती।
गांव के बदले सुविधायुक्त नया गांव बसाने पर सहमति।
मुआवजा राशि बढ़ाने पर चर्चा (12.30 लाख से बढ़ाकर 25 लाख तक संभव)।
आदिवासी महिलाओं के लिए विशेष पैकेज।
कट-ऑफ डेट अप्रैल 2026 करने पर विचार।
प्रशासन ने 14 प्रभावित गांवों में विशेष दल गठित कर दिए हैं जो मुआवजा विसंगतियों और पुनर्वास संबंधी आवेदनों की जांच करेंगे।
आंदोलनकारियों का भरोसा अभी नहीं टूटा
हालांकि प्रशासन की सहमति के बावजूद आंदोलनकारी सतर्क हैं। उनका कहना है कि पहले भी कई बार लिखित आश्वासन दिए गए लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें लागू नहीं किया गया। जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा ‘यह सिर्फ अधिकार की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। जब तक फैसले जमीन पर नहीं उतरेंगे, आंदोलन जारी रहेगा। हम पानी में खड़े हैं, भूखे हैं और चिता पर लेटने को भी तैयार हैं।’ आंदोलन में हजारों आदिवासी महिलाएं, बच्चे और किसान शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ संदेश है ‘मिट्टी हमारी, नदी हमारी, गांव हमारा… मनमानी अब नहीं चलेगी।’
आंदोलन कब और कैसे शुरू हुआ ?
यह आंदोलन अप्रैल 2026 की शुरुआत में जय किसान संगठन के बैनर तले शुरू हुआ। संगठन ने पहले न्याय अधिकार पदयात्रा निकाली और प्रभावित परिवारों की समस्याएं सुनीं। ग्रामीणों का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण, ग्रामसभा और पुनर्वास की प्रक्रिया में उनकी सहमति नहीं ली गई और दस्तावेज भी नहीं दिखाए गए। 5 अप्रैल से सटई तहसील के दौधन बांध क्षेत्र में धरना शुरू हुआ। इसके बाद चिता आंदोलन, मिट्टी सत्याग्रह और भूख हड़ताल जैसी शांतिपूर्ण लेकिन प्रभावी शैलियां अपनाई गईं। प्रशासन ने आंदोलन के दूसरे दिन धारा 163 लगा दी थी, जिससे बाहरी लोगों के आने पर रोक लग गई।
क्या है मामला ?
केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ परियोजना का हिस्सा है। इसके तहत दौधन बांध का निर्माण हो रहा है, जो पूरा होने पर करीब 9000 हेक्टेयर भूमि (जिसमें बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र शामिल) को डुबो देगा। इससे 10 से ज्यादा गांव प्रभावित होंगे। इसके अलावा मझगांव और रुंज बांध परियोजनाएं भी प्रभावित क्षेत्रों में हैं। सरकार का दावा है कि परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पीने का पानी और बिजली मिलेगी, लेकिन स्थानीय लोग उचित मुआवजे, पारदर्शी सर्वे और सही पुनर्वास की मांग कर रहे हैं।
गुरुवार 16 अप्रैल को आंदोलनकारियों की बड़ी बैठक बुलाई गई है, जिसमें तय होगा कि आंदोलन को स्थगित किया जाए या और तेज किया जाए। प्रशासन ने भी सर्वे रिपोर्ट 7 दिनों में मांगी है। यह आंदोलन विकास बनाम अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक बनता जा रहा है। दोनों पक्षों की बातचीत जारी है लेकिन अंतिम फैसला जमीनी हकीकत पर निर्भर करेगा।











