छतरपुर, मध्य प्रदेश। केन नदी की गोद में खड़े होकर आदिवासी महिलाएं गोद में बच्चों को लिए, हाथों में तख्तियां थामे 12 दिन तक जलसत्याग्रह कर रही थीं। उनके चेहरे पर गुस्सा था, आंखों में आंसू और दिल में एक ही सवाल – ‘हमारी जमीन, जंगल और घर किसकी भेंट चढ़ाए जा रहे हैं?’ यह ‘चिता आंदोलन’ और ‘जलसत्याग्रह’ का वो सिलसिला था जो 8 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 16 अप्रैल तक चला लेकिन अब यह 12 दिन पुराना आंदोलन सशर्त खत्म हो गया है। प्रशासन के आश्वासन पर किसानों और आदिवासियों ने 10 दिन की मोहलत दी है अगर मांगें पूरी न हुईं तो फिर बड़ा आंदोलन किया जाएगा ।
16 अप्रैल 2026 को छतरपुर जिला प्रशासन की टीम ढोडन गांव पहुंची। कलेक्टर पार्थ जैसवाल के निर्देश पर जिला पंचायत सीईओ शिवाय अरजड़िया समेत अधिकारियों ने 4-5 घंटे तक आंदोलनकारियों से बातचीत की। नतीजा? आंदोलन स्थगित हो गया लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा ‘यह सिर्फ 10 दिनों का ब्रेक है। अगर सर्वे में गड़बड़ियां सुधार नहीं हुईं, मुआवजा पैकेज नहीं बढ़ाया गया और नाम छूटे प्रभावितों को शामिल नहीं किया गया तो फिर सड़क पर उतरेंगे।’
क्या है मामला ?
Ken betwa link project: केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है। 44,605 करोड़ रुपये की इस परियोजना में केन नदी पर 77 मीटर ऊंचा दौधन बांध (ढोडन बांध) बनाया जा रहा है। पानी को 221 किमी लंबे लिंक कैनाल से बेतवा नदी में मोड़ा जाएगा। जिसका उद्देश्य है बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों (छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह आदि) में 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन को सिंचाई, 62 लाख लोगों को पीने का पानी और 103 MW बिजली।
लेकिन पन्ना टाइगर रिजर्व में 23 लाख से ज्यादा पेड़ कटेंगे, 10,500 हेक्टेयर जंगली इलाका डूबेगा। छतरपुर-पन्ना के करीब 40 गांव (मजगवां, विश्वरामगंज, नेगवा आदि) प्रभावित। हजारों आदिवासी-किसान परिवार विस्थापित होंगे। और इन्हीं मुद्दों पर आंदोलन 2023 से चल रहा था, लेकिन अप्रैल 2026 में तेज हो चला। 8 अप्रैल को ‘चिता आंदोलन’ – महिलाएं चिता पर लेटकर बोलीं ‘विस्थापन मौत से बदतर है’। फिर ‘जलसत्याग्रह’, ‘मिट्टी सत्याग्रह’, ‘चूल्हा बंद’ पूरा परिवार भूखा रहकर विरोध किया। निर्माण कार्य 10-12 दिन तक पूरी तरह ठप रहा, एनसीसी कंपनी को करोड़ों का नुकसान।
आंदोलनकारियों का कहना था “हमारी पुश्तैनी जमीन, जंगल छीन लिए जा रहे हैं। मुआवजा नाम मात्र का, सर्वे में नाम छूट गए, पुनर्वास का कोई प्लान नहीं। बच्चे डर के माहौल में जी रहे हैं। नदी जिसके पानी के लिए यह बांध बन रहा है, वही हमें बेघर कर रही है।
प्रशासन का आश्वासन
- एसडीएम स्तर के अधिकारी गांव-गांव जाकर 7 दिन का ताजा सर्वे करेंगे।
- प्रभावित गांवों में कैंप लगेंगे, ग्राम सभाएं होंगी।
- नाम छूटे लोगों को सूची में जोड़ा जाएगा।
- मुआवजा पैकेज बढ़ाने का प्रस्ताव शासन स्तर पर भेजा जाएगा।
पन्ना और छतरपुर दोनों जिलों का प्रशासन मिलकर काम करेगा।”
लेकिन सवाल अभी भी बाकी हैं। क्या 10 दिन में सब ठीक हो जाएगा? क्या CSR फंड, पुनर्वास पैकेज और पर्यावरणीय मुआवजा मिलेगा? क्या पन्ना टाइगर रिजर्व की हिफाजत होगी? देश भर में नदी जोड़ो परियोजनाओं पर बहस तेज है – विकास जरूरी है, लेकिन क्या कीमत हमेशा गरीब आदिवासी और किसान चुकाएंगे? अभी सबकी नजर उन 10 दिनों पर है। अगर प्रशासन जमीन पर काम दिखाया तो शांति बनी रहेगी। वरना छतरपुर-पन्ना फिर से उबल उठेगा। केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित हो या फिर विस्थापन का नया अध्याय यह अगले 10 दिन तय करेंगे।










