रायपुर। मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से रायपुर के ग्रीन पैराडाइज सोसायटी में ‘प्रेमचंद और युवा… स्वप्न, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, युवा पीढ़ी की सामाजिक भूमिका और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जसम के राष्ट्रीय सचिव एवं संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पंच परमेश्वर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें जुम्मन शेख की मौसी का संवाद, ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे?’, आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले ऐसा माहौल बनने लगा था कि लोग सच बोलने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने से डरने लगे हैं, लेकिन नई पीढ़ी (जेन-जी) ने यह साबित किया है कि वह अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बिना भय के आवाज उठाना जानती है। उनके अनुसार, युवा पीढ़ी ने यह संदेश दिया है कि तानाशाही के सामने झुकने के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना जरूरी है।
गोष्ठी में किसान प्रतिनिधि नरोत्तम शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद ने बहुत पहले ही किसानों और मजदूरों की समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान दिया था। उन्होंने कहा कि आज भी किसानों और श्रमिकों की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखने की जरूरत है।
संस्कृतिकर्मी समीक्षा नायर ने सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में जेन-ज़ी की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। इस दौरान जसम की प्रदेश अध्यक्ष रुपेंद्र तिवारी का आलेख भी पढ़ा गया, जिसमें प्रेमचंद के साहित्य को सामाजिक चेतना और जनपक्षधरता का महत्वपूर्ण आधार बताया गया।
आलेख में कहा गया कि छात्र-युवा आंदोलनों में नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी इस बात का संकेत है कि प्रेमचंद की यथार्थवादी दृष्टि आज भी समाज को दिशा देने का काम कर रही है। प्रेमचंद का साहित्य अन्याय के खिलाफ खड़े होने और समाज की वास्तविकताओं को समझने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध गायिका वर्षा बोपचे ने शिवकुमार पराग के गीत ‘अब हो सकें तो कोई शम्मा जलाइए, इस दौर-ए-सियासत का अंधेरा मिटाइए… ’ की प्रस्तुति दी। उन्होंने जसम के वरिष्ठ साथी सिरिल साइमन के गीत भी प्रस्तुत किए।
वहीं, कवि भागीरथी वर्मा ने छात्र-युवाओं और सामाजिक संघर्षों पर आधारित अपनी रचनाओं का पाठ किया।
डॉ. पूनम संजू ने प्रेमचंद के जीवन और उनके गांव लमही से जुड़े अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रेमचंद केवल महान साहित्यकार ही नहीं, बल्कि सच्चे यथार्थवादी लेखक थे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने जीवन और साहित्य दोनों में सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी।
संस्कृतिकर्मी सीमा कुजूर ने कहा कि ऐसे समय में जब समाज में निराशा का माहौल दिखाई देता है, नई पीढ़ी के आंदोलन उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि अच्छी साहित्यिक परंपरा को युवाओं तक पहुंचाना समाज की साझा जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम का संचालन लेखिका सनियारा खान ने किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद केवल किसानों और मजदूरों के लेखक नहीं थे, बल्कि वे हर पीढ़ी, विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों से जुड़े अनेक लोगों ने भाग लिया।








