लेंस डेस्क। अमेरिका और ईजरायल के साझा हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने के बाद अब आगे क्या होगा? अमेरिका जहां ईरान में तख्तापलट की उम्मीद में बैठा है, वहीं ईरान के पास इस चुनौती से निपटने के क्या संभावित रास्ते हैं और ईरान बदला लेने के लिए किस हद तक जा सकता है? इस सवाल को लेकर दुनियाभर में चर्चाएं तेज हो हैं।
ईरान में आयतुल्लाह अली खामेनेई का लगभग तीन दशक तक शासन रहा है। खामेनेई की मौत के बाद सीनियर धर्मगुरु अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी को ईरान का अंतरिम सुप्रीम लीडर बनाया गया है। ऐसे में तुरंत तख्तापलट जैसी कोई संभावना बनती नहीं दिखाई दे रही है, क्योंकि सैन्य विद्रोह जैसा संकट नहीं है।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ शोसल पोस्ट में यह जरूर कहा कि ईरान की जनता के पास यह अच्छा मौका अपना देश वापस पाने का। ट्रंप के इस बयान को रजा पहलवी से जोड़कर देखा जा रहा है। रजा पहलवी ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के निर्वासित पुत्र हैं, जो फिलहाल अमेरिका में रह रहे हैं और ट्रंप के संपर्क में हैं।
सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने इस ताजा तनाव को लेकर एक्स पर पोस्ट किया है। जिसमें उन्होंने कहा है कि ट्रंप और नेतन्याहू ने खामेनेई की हत्या करके ईरान में तख्तापलट के सैन्य मिशन को और ज्यादा मुश्किल बना दिया है। खामेनेई की हत्या से बहुत अस्थिर स्थिति बन गई है, जो सीधे शिया विचारधारा के शहादत और विरोध-प्रतिरोध से जुड़ती है।
शिया राजनीतिक संस्कृति में जब विदेशी ताकतों द्वारा सर्वोच्च नेता की हत्या होती है, तो लोग इसे तुरंत करबला की घटना से जोड़ते हैं, जहां इमाम हुसैन को शहीद किया गया था। जो काम नेतृत्व को खत्म करना था, वह अब पवित्र बलिदान बन जाता है।
ईरान ने 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया और खामेनेई की मौत को शहादत कहा। इससे वे मजलूमियत (पीड़ित होने का गुण) का इस्तेमाल कर रहे हैं। शोक अब लोगों को एकजुट करने का हथियार बन गया है और मध्य पूर्व की संस्कृति में (सुन्नी और शिया दोनों में) बदला लेना बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है।
ईरान बदला लेने के लिए किस हद तक जा सकता है?

ईरान ने बदला लेना शुरू कर दिया है। इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल-ड्रोन हमले, जिनमें सैकड़ों मौतें का दावा ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने किया है। क्षेत्रीय देशों जैसे सऊदी, बहरीन पर भी हमले किए गए। लेकिन उनकी वायु रक्षा और सेना कमजोर है, इसलिए बड़े हमले सीमित हैं। इसके पीछे ईरान का तर्क यह है वह सिर्फ अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हमला बना रहा है, उन देशों के साथ उनका कोई सीधा हमला नहीं है।
एक संभावित कदम जिसमें और घातक मिसाइल हमले, साइबर अटैक या सहयोगियों (हूती, हिजबुल्लाह) से हमले करने की भी है। लेकिन जानकार इसे प्लान बी के तौर पर देख रहे हैं।
ईरान ने क़ोम शहर की जामकारन मस्जिद के गुंबद पर “प्रतिशोध का लाल झंडा” फहराया है। यह प्रतीकात्मक कदम शिया परंपरा में न्याय और बदले की मांग का संकेत है, जो खामेनेई की मौत पर समर्थकों के गुस्से और प्रतिक्रिया की भावना को दर्शाता है।
चीन और रूस ने ईरान के समर्थन में हमलों की निंदा की, इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया। यूरोप ने सतर्कता बरतने की अपील की और संयुक्त राष्ट्र ने शांति की मांग की। ऐसे में एक संभावना यह भी है कि ईरान मदद के लिए चीन और रूस के पास जाए। लेकिन चीन और रूस क्या इस तनाव में कूद कर सीधे तौर पर अमेरिका और इजायल से मोर्चा लेंगे इसे लेकर मजबूत संभावना बनती नहीं दिख रही है। हालांकि बैकडोर से ईरान की मदद से इनकार भी नहीं किया जा रहा है।
आंतरिक चुनौतियों से निपटने के क्या हैं रास्ते?
ईरान का सिस्टम खामेनेई पर निर्भर नहीं है। वहां एक ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ नामक संस्था है, जो नए सर्वोच्च नेता चुनती है। फिलहाल, अंतरिम नेतृत्व में अलिरेजा अराफी जैसे कट्टरपंथी नेता शामिल हैं, और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और अन्य अधिकारी काम संभाल रहे हैं।
यह संभव है कि आगे चलकर खामेनेई के बेटे मोजताबा या किसी अन्य कट्टरपंथी को देश का सर्वोच्च नेता बनाया जा सकता है। खामेनेई की मौत को राष्ट्रीय नुकसान बताकर ईरान उस गुस्से को शांत कर सकता है, जो खामेनेई के खिलाफ वहां है।
ईजरायल और अमेरिकी खूफिया ऐजेंट की तलाश के लिए ईरान बड़े पैमाने पर अभियान चला सकता है और उनकी हत्या तक कर सकता है। जैसा कि पिछले 12 दिनों के युद्ध के बाद देखा गया था।










