भारत-अमेरिका समझौताः असंतुलित और मनमाना

india-us trade agreement

भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते का ऐलान जिस पृष्ठभूमि और जिन हालात में अमेरिका से किया गया है, वही अपने आपमें पूरी कहानी कह देता है।

आखिर चार महीने से जो समझौता लटका हुआ था और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से भारत पर ईरान से लेकर रूस तक से किसी भी तरह के कारोबारी रिश्तों को तोड़ने का दबाव बना रहे थे, उसे अचानक कैसे अंजाम दे दिया गया?

यह कितना बेमेल और अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ समझौता है, यह अमेरिका से जारी किए गए संयुक्त बयान में देखा जा सकता है, जिसके मुताबिक यूएस-इंडिया बाइलैट्रल एग्रीमेंट (बीटीए) के तहत भारत से अमेरिका निर्यात किए जाने वाले सामान में कोई कर नहीं लगेगा, लेकिन अमेरिका से भारत आने वाले सामानों पर अमेरिका 18 फीसदी टैरिफ लगाएगा!

ट्रंप ने दावा किया है कि भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदने का भरोसा दिलाया है, और यदि वह उससे तेल खरीदता है, तो वह भारत पर अतिरिक्त टैरिफ ठोंक देंगे!

यह सरासर भारत की विदेश नीति में दखल है, जिसे लेकर मोदी सरकार को स्थिति साफ करनी चाहिए। जब इस समझौते के कसीदे पढ़ने के लिए प्रेस के सामने आए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से पूछा गया तो उनका जवाब था कि इस बारे में विदेश मंत्रालय ही बता सकता है! और जब विदेश मंत्री जयशंकर से पूछा गया तो उन्होंने भी पल्ला झाड़ लिया।

यह वाकई बेहद गंभीर मामला है। इससे पहले सरकार चाहे किसी भी दल या गठबंधन की रही हो, उसने किसी दूसरे देश से रिश्ते में किसी तीसरे देश के दखल की इजाजत नहीं दी थी। भारतीय विदेश नीति इतनी लचर पहले कभी नहीं रही।

यही नहीं, भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर के सामान खरीदने का भी वादा किया है, जिनमें एनर्जी प्रोडक्ट, विमान, विमानों के कलपुर्जे, कीमती धातु, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोल तक शामिल है। दूसरी ओर अमेरिका पर भारत से सामान मंगवाने की कोई बाध्यता नहीं है। इसे असंतुलन और मनमाना कदम नहीं कहा जाए तो और क्या कहा जाए?

अमेरिका से आने वाले सामानों में पशु आहार, सोयाबीन तेल और डेयरी उत्पाद तक शामिल हैं, जिसे लेकर संयुक्त किसान मोर्चा और कृषि क्षेत्र के जानकारों तथा विशेषज्ञों ने कड़ा एतराज किया है और इसे अमेरिका के आगे समर्पण करार दिया है।

हैरानी नहीं है कि, अभी सिर्फ संयुक्त बयान आया है और इसे भी अंतरिम समझौता कहा जा रहा है, लेकिन मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसे सबसे बड़ा समझौता बता रहा है और प्रधानमंत्री मोदी का महिमामंडन कर रहा है। लेकिन उसके पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं कि आखिर किस आधार पर यह जश्न मनाया जा रहा है?

क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि अटल बिहारी वाजपेयी की पिछली एनडीए सरकार के समय अमेरिका में भारतीय सामानों पर औसतन 3.3 फीसदी का टैरिफ था। उनके बाद आई मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के समय तो यह घट कर 2.9 फीसदी रह गया था।

डोनाल्ड ट्रंप जबसे दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं उन्होंने मनमाने ढंग से दूसरे देशों पर टैरिफ लगाया है, जिससे भारत भी नहीं बचा। दरअसल उनका यह कदम अपनी मनमर्जी से व्यापार समझौते को अमेरिका की ओर झुकाना था, जिसे इस समझौते में देखा जा सकता है।

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