भारत एक चुनाव-प्रधान देश है

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि हम अमीर बनने से पहले बूढ़े हो जाएंगे। हम हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं। पार्टियों को तात्कालिक वोट की बजाय दीर्घकालिक विकास पर फोकस करना चाहिए। लगातार चुनावी दबाव से संरचनात्मक सुधार रुक जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और कौशल विकास पर पर्याप्त खर्च की जरूरत है। रोजगार सृजन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकारें फ्रीबीज की बजाय अच्छे रोजगार पैदा करने पर ध्यान दें।

नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी का साफ कहना है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहा है। वे असमानता, बेरोजगारी और डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने नीतिगत ब्लूप्रिंट में सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना भी की है।

आईएमएफ में काम कर चुके अर्थशास्त्री अशोक मोदी भी यही राय रखते हैं कि लोकलुभावन योजनाएँ बनाकर वोट बैंक लुभाने के बजाय सरकार को ठोस काम करना चाहिए, जिससे अर्थव्यवस्था आगे बढ़े। वास्तविक विकास की बजाय सरकारी खर्च पर निर्भरता बढ़ रही है।

जयति घोष मानती हैं कि असमानता बेहद बढ़ गई है और लगातार बढ़ती ही जा रही है। भारत अरबपति राज बन गया है और हालात ब्रिटिश काल से भी बदतर हैं। युवा बेरोजगारी और सूक्ष्म-लघु उद्योगों की बदहाली साफ नजर आ रही है।

भारत सरकार की आर्थिक नीतियों की निंदा करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री मुख्य रूप से निजी निवेश की कमी, बेरोजगारी, आय असमानता, जीडीपी डेटा की विश्वसनीयता, प्रदूषण और लोकलुभावन योजनाओं पर सरकार का ध्यान दिला रहे हैं।

कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें, खासकर बीजेपी शासित केंद्र सरकार, लगातार चुनावी रणनीतियों में व्यस्त रहती हैं, जिससे लंबी अवधि के आर्थिक सुधारों, निजी निवेश और संरचनात्मक बदलावों पर ध्यान कम पड़ जाता है। इस परमानेंट इलेक्शन मोड की आलोचना प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने बार-बार की है। वे कहते हैं कि लोकलुभावन योजनाएँ वोट बैंक के लिए उपयोगी साबित होती हैं, लेकिन ये शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च को भीड़ देती हैं तथा भविष्य की पीढ़ियों पर कर्ज का बोझ डालती हैं।

अगर भारत को वाकई विकसित राष्ट्र बनना है, तो तमाम पार्टियों को चुनावी फायदे से ऊपर उठकर अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी, वरना आज का वोट, कल का कर्ज वाली स्थिति बनी रहेगी। यह आलोचना किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है, लेकिन केंद्र की बीजेपी सरकार पर सबसे ज्यादा फोकस इसलिए है क्योंकि वह राष्ट्रीय नीति-निर्माण को प्रभावित करती है।

भारत में लोकलुभावन योजनाएं मुख्य रूप से चुनावी वादों के रूप में उभरती हैं, जिनमें मुफ्त बिजली, पानी, बस यात्रा, नकद हस्तांतरण, बेरोजगारी भत्ता, किसान ऋण माफी और महिलाओं को मासिक सहायता जैसी स्कीमें शामिल हैं। इन्हें अक्सर रेवड़ी कल्चर कहा जाता है। ये योजनाएँ अल्पकालिक राहत देती हैं, लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और प्रमुख अर्थशास्त्रियों के अनुसार ये दीर्घकालिक विकास को नुकसान पहुँचाती हैं।

प्रमुख राज्यों में फ्रीबी का पैटर्न लगभग एक समान है। महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश आदि में महिलाओं को लक्षित कैश ट्रांसफर प्रमुख हैं, जैसे लाडली बहना, लड़की बहना, महिला सम्मान आदि। पंजाब और आंध्र प्रदेश में फ्रीबी खर्च जीएसडीपी यानी ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट का 2% से ज्यादा हो गया है।

तमिलनाडु में सब्सिडी खर्च सबसे ऊँचा है, जो एक लाख 47 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। कई राज्यों में फ्री बिजली किसानों को दी जाती है, तो कहीं पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली (जैसे हिमाचल, राजस्थान) भविष्य में बड़ा बोझ बन सकती है।

ये योजनाएँ अक्सर चुनाव से पहले घोषित की जाती हैं और सभी प्रमुख दलों यथा बीजेपी, कांग्रेस, आप तथा अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा अपनाई जाती हैं। इससे वोट प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिलती है, लेकिन सरकार का खर्च स्थिर हो जाता है और बजट में लचीलापन खत्म हो जाता है। राज्यों में ब्याज भुगतान राजस्व का बड़ा हिस्सा खा जाता है।

केरल, पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी और तमिलनाडु में 2026 विधानसभा चुनावों के दौरान सभी प्रमुख दलों ने चुनावी घोषणाएँ की हैं, जिनमें लोकलुभावन योजनाओं का बड़ा हिस्सा है। इनमें महिलाओं को मासिक नकद सहायता, फ्री एलपीजी सिलेंडर, फ्री बस यात्रा, पेंशन बढ़ोतरी, फ्री रेफ्रिजरेटर, मेडिकल इंश्योरेंस और अन्य सब्सिडी शामिल हैं।

केरल में यूडीएफ (कांग्रेस गठबंधन) ने 5 गारंटी दी हैं : महिलाओं को फ्री बस यात्रा, परिवार को स्वास्थ्य बीमा, कॉलेज लड़कियों को स्टाइपेंड, युवा उद्यमियों को वित्तीय सहायता और पेंशन 3,000 रुपये तक बढ़ाना। वहीं एलडीएफ (वाम मोर्चा) ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन 3,000 रुपये, असीमित चिकित्सा सहायता, बुजुर्ग देखभाल, सभी को पेयजल एवं आवास, महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत रोजगार और दुर्घटना बीमा का वादा किया है। एनडीए/बीजेपी ने भी पेंशन 3,000 रुपये, दो फ्री एलपीजी सिलेंडर सालाना (ओणम-क्रिसमस पर), हाई-स्पीड रेल आदि वादे किए हैं।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (ममता बनर्जी) ने सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1,500 रुपये और एससी/एसटी वर्ग की महिलाओं को 1,700 रुपये मासिक कैश ट्रांसफर, युवाओं को 1,500 रुपये मासिक बेरोजगारी भत्ता, इमाम-मुएज्जिन-पुरोहितों को सम्मान राशि, छात्र सहायता और त्योहारों पर खर्च देने का वादा किया है। पश्चिम बंगाल पर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है, जिससे प्रति व्यक्ति कर्ज करीब 80,000 रुपये हो गया है।

असम में बीजेपी ने अरुणोदय स्कीम के तहत महिलाओं को 1,250 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये मासिक करने, कवरेज 15 लाख परिवारों तक बढ़ाने और 9,000 रुपये प्रति महिला ट्रांसफर का ऐलान किया है, जिससे 3,600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा। इसके अलावा 2 लाख सरकारी नौकरियाँ, 10 लाख युवाओं को उद्यमिता सहायता और फ्लड-फ्री असम के लिए 18,000 करोड़ रुपये की योजना भी पेश की गई है।

तमिलनाडु में डीएमके ने महिलाओं को 1,000 रुपये से 2,000 रुपये मासिक देने, 8,000 रुपये के अप्लायंस खरीदने के लिए कूपन और 35 लाख छात्रों को फ्री लैपटॉप देने का वादा किया है। वहीं एआईएडीएमके ने महिलाओं को 2,000 रुपये मासिक, हर राशन कार्ड धारक को मुफ्त रेफ्रिजरेटर, 3 फ्री एलपीजी सिलेंडर, शिक्षा ऋण माफी और युवाओं को 25 लाख रुपये तक कोलेटरल-फ्री लोन का वचन दिया है।

पुडुचेरी जैसे छोटे राज्य में भी बीजेपी ने दो फ्री एलपीजी सिलेंडर सालाना (पोंगल-विनायक चतुर्थी), लड़कियों को फ्री ई-स्कूटर, महिलाओं को पिंक ऑटो सब्सिडी 50,000 रुपये और बीपीएल बुजुर्गों को फ्री मोतियाबिंद ऑपरेशन का वादा किया है। कांग्रेस ने महिलाओं को फ्री बस यात्रा, परिवार को 20 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा और बेरोजगार युवाओं को 2,000 रुपये मासिक देने का वचन दिया है।

इसका एक पहलू यह भी है कि जब पार्टियाँ, खासकर बीजेपी , उद्योगपतियों से चंदे के रूप में मिलने वाली मदद के एवज में अरबों रुपये की भारी-भरकम छूट देती हैं, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव देती हैं, तो फिर ये अर्थशास्त्री साधारण लोगों को मिलने वाली मदद पर ही क्यों नजर गड़ाए रहते हैं? सरकार टैक्स रेट कट करती है (जैसा 2019 में कॉर्पोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत किया), लैंड एक्विजिशन में मदद करती है, निर्यात पर छूट देती है, बेलआउट और रिस्ट्रक्चरिंग करती है, पर्यावरण क्लीयरेंस, लैंड अलॉटमेंट, टैक्स डिस्प्यूट में राहत देती है तो उसका भी तो हिसाब होना चाहिए।

एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में बीजेपी को कुल कॉर्पोरेट चंदे का 91 प्रतिशत मिला था, जो 6,088 करोड़ रुपये था। कांग्रेस को इस साल करीब 517 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। टाटा समूह, मुरुगप्पा ग्रुप, जिंदल और भारती जैसे उद्योग समूहों ने मोटा फंड दिया था। अडानी और अंबानी समूहों ने कितना धन दिया, इसका सटीक आंकड़ा सार्वजनिक डोमेन में नहीं है। नेता प्रतिपक्ष आरोप लगाते हैं कि इन उद्योग समूहों को सरकार करीब 16 लाख करोड़ रुपये की मदद कर चुकी है।

भारत अब कृषि-प्रधान देश नहीं, बल्कि चुनाव-प्रधान देश बन गया है, जहां पार्टियां पांच साल तक चुनाव की ही तैयारी करती रहती हैं। लोकलुभावन वादे उनके लिए जीत का शॉर्टकट लगते हैं, भले ही उससे आर्थिक हालत चौपट हो जाए।

यह भी पढ़ें:

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now