यह उम्मीद करना तो बेकार ही है कि भाजपा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा पर उनके विवादास्पद विडियो को लेकर कोई कार्रवाई करेगी, जिसमें वह मुस्लिम समुदाय के लोगों के चित्रों पर फायरिंग करते नजर आए थे। भले ही असम भाजपा ने भारी विवाद के बीच अपने एक्स हैंडल से ये वीडियो हटा लिया है, लेकिन यह विडियो एक्स सहित अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अब भी उपलब्ध है।
दरअसल सवाल देश के संविधान के प्रति जवाबदेह असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य और केंद्र की मोदी सरकार से है, कि क्या यह वीडियो उनके संज्ञान में नहीं आया जिसमें मुख्यमंत्री सरमा संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों के चित्रों पर राइफल से गोलियां दागते नजर आते हैं?
‘पाइंट ब्लैंक शूट’ के नाम से जारी किए गए इस वीडियो के पीछे की मंशा को लेकर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। यह उस राजनीतिक कथानक का ही हिस्सा है, जिसके जरिये भाजपा और खासतौर से हिमंता बिस्व सरमा असम में कथित रूप से मुस्लिम बांग्ला घुसपैठियों का मुद्दा उठाकर आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहते हैं।
ज्यादा दिन नहीं हुए जब सरमा ने मियां मुस्लिम रिक्शावालों के खिलाफ विवादास्पद बयान देकर मुख्यमंत्री पद की गरिमा को धूमिल किया था।
असम में जब एनआरसी की कवायद सात साल पहले ही पूरी कर ली गई है और इसी के कारण चुनाव आयोग ने वहां मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) भी नहीं करवाया है, तो फिर हिमंता बिस्व सरमा किस आधार पर मुस्लिमों को निशाना बना रहे हैं?
यह बात तो भाजपा और उसकी आईटी सेल भी जानती होगी कि सोशल मीडिया के इस दौर में किसी एक हैंडल से कोई वीडियो भले हटा लिया जाए, लेकिन उसके असीमित प्रसार को रोकना लगभग असंभव है।
सच बात तो यह है कि मियां मुस्लिमों या कथित घुसपैठियों के नाम पर दिए जाने वाले भड़काऊ और धमकाने वाले बयानों और वीडियो जारी करने के बाद हिमंता बिस्व सरमा को एक भी पल मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का हक नहीं है। उनकी हरकतें भारतीय लोकतंत्र और उसके संविधान का खुलेआम अपमान है।











