न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महिला स्थिति आयोग की बैठक, आदिवासी महिलाओं के मुद्दों पर FIMI ने उठाई आवाज, भारत से डॉ.वासवी किरो हुईं शामिल

March 23, 2026 12:53 AM

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी महिला मंच International Indigenous Women’s Forum (FIMI) का एक प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में चल रही महिला स्थिति आयोग (Commission on the Status of Women – CSW70) की 70वीं बैठक में हिस्सा लिया। यह महत्वपूर्ण वैश्विक बैठक 9 से 19 मार्च 2026 तक न्यूयॉर्क में आयोजित की गई, जिसमें मुख्य विषय सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए न्याय तक पहुंच को मजबूत करना रहा। उद्घाटन समारोह में FIMI की महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया और दुनिया भर से आए 20 आदिवासी महिलाओं के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

CSW70 के मुख्य सत्रों में आदिवासी (इंडिजिनस) और ट्राइबल महिलाओं के विशिष्ट मुद्दों पर कोई विशेष चर्चा नहीं हुई। सामान्य विषयों जैसे महिलाओं के खिलाफ ट्रैफिकिंग, न्याय और अधिकारों पर बात हुई, और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी इन मुद्दों पर जोर दिया। FIMI ने अपने विशेष साइड इवेंट और कोऑर्डिनेशन मीटिंग में इस कमी को उजागर किया और मांग की कि CSW जैसे वैश्विक मंचों पर आदिवासी महिलाओं को उचित स्थान और जगह मिलनी चाहिए। एशिया के देशों जैसे भारत, जापान और नेपाल के FIMI प्रतिनिधिमंडल ने आदिवासी महिलाओं पर हो रहे उत्पीड़न और अत्याचार के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा।

FIMI की ओर से इस बैठक में झारखंड की प्रसिद्ध आदिवासी कार्यकर्ता और नेता डॉ. वासवी किरो ने प्रमुख भूमिका निभाई। डॉ. वासवी किरो Torang Trust की सह-संस्थापक और वर्तमान में इसकी प्रमुख हैं, साथ ही Indigenous Women India Network (I-WIN) की संस्थापक और कोऑर्डिनेटर हैं। वे FIMI से जुड़ी हुई हैं और आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकारों, लिंग समानता, आदिवासी चिकित्सा संरक्षण और सामाजिक न्याय के लिए लंबे समय से काम कर रही हैं। डॉ. वासवी किरो ने FIMI के प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर आदिवासी महिलाओं की आवाज को वैश्विक स्तर पर मजबूती से उठाया।

उन्होंने कहा कि ‘डायन’ प्रथा के नाम पर महिलाओं के साथ हिंसा बदस्तूर जारी है। गैर-सरकारी अध्ययनों में पाया गया है कि बीते पांच सालों में लगभग 2500 महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया है, जबकि कुछ रिपोर्ट्स में अनुमान है कि लगभग 75,000 महिलाएं उत्पीड़न झेल रही हैं। भारत में इसके लिए कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 2001 (बिहार में 1999 से अपनाया गया) और छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम जैसे राज्य कानून बने हैं, लेकिन ये कानून लचर और कमजोर हैं। इस वजह से डायन बताकर मार दी जा रही महिलाओं को न्याय नहीं मिल पा रहा है। डॉ. वासवी ने कहा कि बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के राज्य कानूनों में संशोधन की आवश्यकता है, और इसके लिए सरकार से वार्ता करने हेतु कदम उठाए जाएंगे।

FIMI ने दुनिया भर के आदिवासी संगठनों को आमंत्रित कर कहा कि अब एकजुट होकर मांग उठाने का समय है। बैठक में फैसला हुआ कि आदिवासी महिलाओं की समस्याएं अलग तरह की हैं और इन्हें अलग से उठाना जरूरी है। इन महिलाओं की आजीविका मुख्य रूप से भूमि, जंगल और वन संसाधनों पर आधारित है, लेकिन इन संसाधनों की लूट हो रही है। उनके साथ हिंसा बढ़ रही है विरोध करने पर मारपीट या हत्या तक हो जाती है। वन अधिकार कानून जैसे कानूनों का पालन नहीं हो रहा, वन उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा, विस्थापन, खनन-खनिज और बाजार में अधिकारों का हनन हो रहा है। ‘डायन’ के नाम पर हिंसा के मामले भी गंभीर हैं, जहां राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड के अनुसार 2000-2005 के बीच 2500 महिलाओं की हत्याएं दर्ज हुई हैं।

डॉ. वासवी किरो ने अपनी सक्रियता से इन मुद्दों को वैश्विक मंच पर हाइलाइट किया और जोर दिया कि आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ठोस रणनीति और सरकारों के साथ लगातार वकालत जरूरी है। FIMI ने सभी आदिवासी महिला संगठनों से अपील की कि वे एकजुट होकर अपने-अपने देशों की सरकारों से बात करें। FIMI का मानना है कि सामूहिक प्रयास और निरंतर संवाद से ही आदिवासी महिलाओं के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। यह बैठक आदिवासी महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई है। डॉ. वासवी किरो जैसी नेताओं की भागीदारी से वैश्विक मंच पर आदिवासी महिलाओं की आवाज और अधिक प्रभावशाली बनी है।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 5 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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