दिवंगत यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़ी विवादास्पद फाइलों को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के आरोपों को भले ही केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सिरे से खारिज कर दिया है, लेकिन उन्होंने एपस्टीन से मुलाकातों से इनकार नहीं किया है। वास्तव में पुरी ने प्रेस के सामने आकर जिस तरह से सफाई दी है, उससे धुंध और गहरा गई है।
लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने दावा किया कि एपस्टीन फाइल में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का भी नाम है और उन्होंने एक उद्योगपति का जिक्र करते हुए सवाल पूछा कि उन्हें एपस्टीन से किनसे मिलवाया?
उनके इस आरोप से मोदी सरकार के मंत्री और भाजपा सदस्य जिस तरह से हमलावर थे, उससे लगता है कि राहुल गांधी ने मोदी सरकार की दुखती रग पर हाथ धर दिया है।
राहुल गांधी के लोकसभा में भाषण के तुरंत बाद प्रेस के सामने आकर हरदीप सिंह पुरी ने दावा किया कि उनकी एपस्टीन से तीन से चार मुलाकातें हुई थीं और ये मुलाकातें व्यक्तिगत नहीं थीं। उन्होंने एपस्टीन फाइल से जुड़ी लाखों ई-मेल का जिक्र करते हुए कहा कि एपस्टीन से उनकी मुलाकात इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (आईपीएस) के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होने के नाते हुई थी।
उन्होंने दावा किया, ‘आईपीआई के मेरे बॉस एपस्टीन को जानते थे और मेरी उनसे तीन या अधिकतम चार बार मुलाकातें हुईं वह भी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य के रूप में। हमारी इस मुलाकात का उस (एपस्टीन) पर लगे आपराधिक आरोपों से कोई लेना-देना नहीं था।‘ इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि हमने ‘मेक इन इंडिया’ के बारे में बात की।
सवाल है कि ‘मेक इन इंडिया’ में एपस्टीन क्या मदद कर सकता था और उससे इस पर बात करने की जरूरत क्यों हुई, जबकि वह किसी आधिकारिक पद पर भी नहीं था?
वास्तव में जेफरी एपस्टीन पर 2005 से फ्लोरिडा में नाबालिगों के यौन शोषण के आरोप में मामला चल रहा था और 2008 में वह 18 महीने जेल काटकर भी बाहर आ चुका था।
क्या यह जानकारी हरदीप सिंह पुरी को नहीं थी? जो जानकारियां सामने आई हैं, उनसे तो यह भी पता चलता है कि हरदीप पुरी की ये मुलाकातें अमेरिका में भारत के राजदूत पद से सेवानिवृत्त होने और यूएन से जुड़ने के बाद की हैं। यही नहीं, एकाध मुलाकात तो तब हुई है, जब वह भाजपा से जुड़ चुके थे।
मोदी सरकार के साथ मुश्किल यह है कि वे लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की संवैधानिक स्थिति को स्वीकार नहीं करना चाहती। और जब वे कोई आरोप लगाते हैं, तो उन पर संसद से लेकर सड़क तक भाजपा हमलावर हो जाती है।
अच्छा तो यह होता कि लोकसभा में लगाए गए आरोपों पर वहीं जवाब दिया जाता। संसद जब चल रही है, तो पुरी ने प्रेस के समक्ष आकर अपना पक्ष रखने का फैसला क्यों किया? क्या इसलिए कि जो आरोप सत्ता पक्ष राहुल गांधी पर लगाता है, वह उन पर लगते कि वे सदन के भीतर जो भी कहेंगे, उसे प्रमाणित करना पड़ेगा?
एक खुले और उदार लोकतंत्र में हर तरह के गंभीर मसले पर, और इस मामले में तो बेहद गंभीर आरोप लगे हैं, चर्चा सदन के भीतर होनी चाहिए।









