असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के विधानसभा चुनावों के नतीजे तकरीबन स्पष्ट हो चुके हैं, तो इनमें छिपे संदेशों को भी आसानी से पढ़ा जा सकता है। इन चुनावों का सबसे बड़ा उलट-फेर पश्चिम बंगाल में हुआ है, जहां भाजपा ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया है। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव भाजपा और मोदी सरकार ने जिस अभूतपूर्व तरीके से लड़ा उसके लिए भी याद रखा जाएगा। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में न केवल महीनों से डेरा डाल रखा था, बल्कि पूरे राज्य में ढाई लाख से भी अधिक सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआईआर के नाम पर बंगाल को संवैधानिक संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया था। इसकी वजह से करीब 30 लाख मतदाता अपने मताधिकार से ही वंचित हो गए! भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना है।
उधर तमिलनाडु में जीत की दहलीज पर खड़े फिल्म स्टार विजय की टीवीके ने छह दशक से सत्ता में बारी-बारी से हिस्सेदारी कर रही द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों को पीछे छोड़कर नई इबारत लिख दी है। 40 सीटों वाले पुदुचेरी में भाजपा गठबंधन की सत्ता में वापसी भाजपा के लिए दक्षिण में सांत्वना पुरस्कार की तरह है। असम में हिमंता बिस्व सरमा की अगुआई में भाजपा की वापसी अप्रत्याशित नहीं है। केरल में वाम दलों का आखिरी गढ़ भी ढह गया है, जहां दस साल बाद कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ ने सत्ता में वापसी की है।
इन नतीजों ने दिखाया है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा को जिस तरह से चुनावी मशीन में बदल दिया है, उसमें चुनावी राजनीति के सारे नियम उलट-पलट गए हैं। यह इसलिए अहम है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई थी और वह एनडीए के अपने सहयोगियों जनता दल (यू) और तेलुगू देशम पार्टी के दम पर ही सरकार बना सकी थी।
इसके बावजूद बीते दो बरसों में मोदी-शाह की जोड़ी ने जिस आक्रमकता के साथ चुनाव जीतने को अपना संस्थागत उपक्रम बना लिया है, वह विपक्षी गठबंधन इंडिया के लिए बड़ी चुनौती है। ध्यान रहे, कांग्रेस भले ही केरल में वापसी पर संतोष कर ले, लेकिन यहां केवल भाजपा के विरोधी गठबंधनों के बीच सत्ता की अदला बदली हुई है। दरअसल इन नतीजों में 2027 के उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य के विधानसभा चुनाव ही नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी भाजपा की ताकत और उसकी रणनीतियों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
अभी चुनावी नतीजों के पूरे आंकड़े आना बाकी हैं, फिर भी, जो आंकड़े और रुझान सामने हैं, उनसे तस्वीर लगभग पूरी तरह साफ हो चुकी है। वास्तव में इन पांचों राज्यों के नतीजे के मायने भी अलग अलग हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है।
असमः हिंदुत्व की राजनीति पर सवार हिमंता
दशक भर पहले कांग्रेस से भाजपा में आए हिमंता बिस्व सरमा लगता है कि भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के नए शुभंकर हैं। पांच साल पहले असम का मुख्यमंत्री बनने के बाद से हिमंता बिस्व सरमा ने न केवल खुलेआम खुलेआम विभाजनकारी राजनीति को हवा दी, बल्कि इस विधानसभा चुनाव के दौरान बांग्लादेशी शरणार्थियों के मुद्दे की आड़ में ध्रुवीकरण करने से भी गुरेज नहीं किया। चुनाव के ऐन बीच में उनकी पत्नी और उनके खिलाफ उठे भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद वह भाजपा को पिछली बार से अधिक सीटें दिलाने में कामयाब हुए हैं। यह असम की बदलती राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त है। यहां के नतीजे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई के लिए झटका हैं, जो जोरहाट सीट से चुनाव हार गए हैं।
केरलः आखिरी वाम किला भी ढह गया
केरल के नतीजों से सर्वाधिक खुश कोई होगा, तो शायद वह भाजपा होगी, बावजूद इसके कि उसे 140 सीटों वाली विधानसभा में मुश्किल से दो सीटें ही मिलती दिख रही हैं। दरअसल ये नतीजे मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की अगुआई वाले एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे वाम मोर्चा के लिए झटका हैं, जिसके पास अब देश में एक भी राज्य सरकार नहीं बची। बेशक, कांग्रेस ने यहां सत्ता में वापसी की है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि यह जीत उसे मोदी सरकार के खिलाफ एक विश्वसनीय सहयोगी वाम मोर्चे की कीमत पर मिली है। वह भी तब जब पिनराई विजयन की सरकार ने कोविड के दौरान देश ही नहीं बल्कि दुनिया में महामारी से निपटने की एक शानदार मॉडल पेश किया था। यही नहीं, केरल में आई भीषण बाढ़ की समय जब केरल की अर्थव्यवस्था लगभग ध्वस्त हो गई थी, विजयन सरकार ने राज्य को फिर से पटरी पर ला दिया था। जाहिर है, ये नजीते वाम धारा की राजनीति के लिए गहरे सदमे से कम नहीं।
तमिलनाडुः द्रविड़ राजनीति का नया सितारा
महज दो साल पहले अस्तित्व में आई दक्षिण भारत के सुपर स्टार जोसेफ विजय की टीवीके (तमिलगा वेट्री कषगम) को मिली जीत तमिलनाडु की राजनीति का नया मोड़ है, जहां बीते छह दशकों से डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) और एआईडीएमके (अन्ना द्रमुक मुनेत्र कषगम) राज करती आई हैं। बेशक टीवीके भी द्रविड़ पार्टी है, लेकिन विजय जिन वादों और शुचिता के दावों के साथ राजनीति में आए हैं और जिस तरह के विवाद उनसे जुड़े रहे, उससे यह अंदाजा नहीं था कि वे दक्षिण की राजनीति का नया सितारा बन जाएंगे। आखिर रजनीकांत ने भारी भरकम घोषणा के बाद अपने कदम पीछे खींच ही लिए थे और कमल हासन ने अकेले चलने की हिम्मत नहीं दिखाई। वास्तव में तमिलनाडु के नतीजे को मोदी-शाह के चश्मे से भी देखने की जरूरत है, जिनके लिए दक्षिण का यह राज्य अब भी बहुत दूर है। हालांकि यह भी कहा जा सकता है कि कम से कम इन चुनावों में उन्हें इसकी परवाह भी नहीं थी, वरना वे महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के साथ ही परिसीमन विधेयक क्यों लाते, जिसे लेकर खासतौर से तमिलनाडु में खासा विरोध है। हालांकि विजय और उनकी टीवीके सरकार बनाने के करीब है और उन्होंने कांग्रेस की ओर हाथ भी बढाया है, इसके बावजूद यह गौर करने की जरूरत है कि उनके पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। कांग्रेस द्रमुक के साथ रही है, और अपनी सीट गंवा चुके निवर्तमान मुख्यमंत्री स्टालिन ने राष्ट्रीय परिदृश्य में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का मुखर होकर समर्थन किया है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या कांग्रेस द्रमुक का साथ छोड़कर विजय का हाथ थामती है। इसके साथ ही यह भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि एआईडीएमके भाजपा के साथ है यानी सीधे शब्दों में कहें, तो भाजपा के चुनावी रणनीतिकार अमित शाह की सीधी देखरेख में है। यानी तमिलनाडु के राजनीतिक घटनाक्रम पर अभी नजर रखने की जरूरत है।
पश्चिम बंगालः इस परिवर्तन का मतलब
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनमें पश्चिम बंगाल के चुनाव को मोदी सरकार और भाजपा ने जिस तरह से अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था, उसमें निहित आरएसएस और भाजपा की दीर्घकालीन राजनीति को समझा जा सकता है। आजादी के आंदोलन, बल्कि उससे भी पहले नवजागरण के समय से बंगाल को राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक प्रदेश माना जाता रहा है। बंगाल की इस विरासत से खुद को जोड़ने को हमेशा भाजपा बेताब रही है। वास्तविकता यह है कि आजादी के बाद से अब तक वहां जो भी सरकारें रहीं, उनमें बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता, उदारता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर कोई भिन्नता नहीं थी। फिर बात, कांग्रेस की सरकारों की हो या लंबे वामपंथी शासन या फिर अभी डेढ़ दशक तक ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांग्रेस की सरकार हो। वास्तविकता यह है कि बंगाल जीतने के लिए मोदी सरकार और भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विपक्षी दलों के नेताओं पर ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल तो आजमाया हुआ औजार है। दरअसल जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बंगाल में मतदाता सूची के संशोधन (एसआईआर) को न्यूनतम उदारत बरतने से भी गुरेज किया, उसकी वजह से करीब 30 लाख मतदाता अपने मताधिकार से ही वंचित हो गए! भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना है। यही नहीं, सर्वोच्च अदालत तक से ऐसे मतदाताओं को कोई राहत नहीं मिली। पूरे चुनाव के दौरान बंगाल में जिस तरह से सुरक्षा बलों की व्यापक रूप से तैनाती की गई वह भी किसी राज्य के चुनाव के संदर्भ में असाधारण घटना है। यही नहीं, चुनाव के ऐन बीच में मोदी सरकार ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को पारित करवाने के लिए संसद का विशेष सत्र आयोजित करवा लिया है, सीधे सीधे बंगाल की महिला मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास ही था। हैरत यह है कि चुनाव आयोग ने सरकार संज्ञान लेना तक जरूरी नहीं समझा।
चुनावी राजनीति में हार जीत होती रहती है और होनी भी चाहिए। दरअसल चुनाव संसदीय लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व हैं।
यह नहीं भूलना चाहिए कि ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी में महिलाओं को महत्व देने से कभी गुरेज नहीं किया। इसी चुनाव की बात करें, तो उन्होंने सर्वाधिक 55 महिलाओं को टिकट दिए थे। ममता बनर्जी की सरकार को हराने की और भी वजहें हो सकती थीं। लेकिन जिस तरह से उनकी सरकार को चौतरफा घेरा गया, उसने नीयत और नीति दोनों पर सवाल खड़े किए हैं।











