वैश्विक अस्थिरता और ट्रेड को लेकर मची उथल-पुथल के बीच संसद में पेश की गई वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में इस साल विकास दर के सात फीसदी से अधिक रहने का अनुमान तो जताया ही गया है, आगामी वर्ष में इसके 6.8 से 7.2 फीसदी रहने का अनुमान है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है।
आर्थिक सर्वेक्षण में बहुआयामी गरीबी में आई गिरावट का जिक्र किया गया है और बताया गया है कि विश्व बैंक की गरीबी के पैमाने के मुताबिक भारत में लगातार गरीबी कम हो रही है। लेकिन सर्वे के आंकड़ों से इतर जब हम गरीबी के आंकड़े को देश में बढती असमानता के साथ रखकर देखते हैं, तो तस्वीर कुछ और हो जाती है।
यह बात अब कई रिपोर्ट्स में आ चुकी है कि शीर्ष दस फीसदी अमीरों के पास राष्ट्रीय आय का 58 फीसदी और कुल संपत्ति का 65 फीसदी हिस्सा है। जबकि नीचे के 50 फीसदी लोगों के पास देश की आय का महज 15 फीसदी है।
बेशक जीडीपी के आंकड़े आश्वस्त करने वाले हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया के 125 देशों से भी पीछे है। मुश्किल यह है कि देश के समृद्ध कार्यबल के पास पर्याप्त काम नहीं है।
आर्थिक सर्वक्षण में देश के 56 करोड़ कार्यबल को विकसित भारत के लक्ष्यों के मद्देनजर एक ताकत बताया गया है। लेकिन रोजगार का पूरा परिदृश्य बेहद मायूस करने वाला है, यह क्या किसी से छिपा है।
सर्वे में स्वीकार किया गया है कि 40 फीसदी गिग वर्कर महीने में 15 हजार रुपये भी कम कमाते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ ही शहरों ही नहीं, बल्कि गांव-कस्बों तक बदलती जीवनशैली का जरूरी हिस्सा बन गए इन्हीं गिग वर्करों ने पहली जनवरी को ही हड़ताल कर ध्यान खींचा था।
सरकार के हस्तक्षेप से दस मिनट की डिलीवरी पर रोक भले लग गई हो, लेकिन गिग वर्कर ही नही, बल्कि असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगारों को सुनिश्चित सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है।
क्या उम्मीद करनी चाहिए कि लगातार अपना नौंवा बजट पेश करने जा रहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे लेकर कोई कदम उठाएंगी?
यह महज इत्तफाक हो सकता है कि जिस दिन संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया उसी दिन डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर हो गया और एक डॉलर रिकॉर्ड 91.99 तक गिरकर 91.92 हो गया।
सर्वे में कहा गया है कि रुपये का कमजोर होना हानिकारक नहीं है। यह बताने की जरूरत है क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच यह दावा कितना कमजोर है। वास्तविकता यह है कि रुपये के कमजोर होने से हमारी आयात लागत बढ़ती है और इसका असर आम आदमी पर पड़ता है।
चिंता की बात यह भी है, जैसा कि आर्थिक सर्वे में भी अनुमान है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण सोने और चांदी के दाम और बढ़ सकते हैं। यही नहीं, आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस डाटा सेंटर की बढ़ती बिजली की मांग के कारण अब कॉपर यानी तांबे के दाम भी बढ़ सकते हैं।
दरअसल आर्थिक सर्वक्षण के ये अनुमान सरकार के लिए चुनौती हैं कि क्या वह बदलती वैश्विक परिस्थितियों के लिए तैयार है?










