लेंस डेस्क। मध्य पूर्व में जारी जंग के बीच भारतीय रुपया आज यानी 20 मार्च को पहली बार 93.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। जंग के कारण उछली कच्चे तेल की कीमतें इसकी सबसे बड़ी वजह बना है। ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर महंगाई का दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से इन्फ्लेशन 0.5% तक चढ़ सकता है।
वहीं गोल्डमैन सैक्स चेतावनी दे चुका है कि अमेरिका- इजरायल, ईरान संघर्ष के असर से रुपया अगले एक साल में 95 प्रति डॉलर तक गिर सकता है। इससे आरबीआई पर भी दबाव बढ़ेगा, क्योंकि तेल आयात बढ़ने से करंट अकाउंट डेफिसिट और महंगाई प्रभावित होगी।
वैश्विक बाजार में कच्चा तेल अब 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है और कुछ समय पहले यह 108-113 डॉलर तक पहुंचा था। भारत में आज 20 मार्च से प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी हो गई है। HPCL का पावर पेट्रोल, IOCL का XP95 और BPCL का स्पीड पेट्रोल 2 से 2.35 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है।
दिल्ली में प्रीमियम पेट्रोल अब करीब 112 रुपये पहुंच गया है, मुंबई में 120 रुपये के पार और भोपाल में 117 रुपये तक। सामान्य पेट्रोल और डीजल की कीमतें अभी नहीं बदली हैं, लेकिन इंडस्ट्रियल डीजल महंगा होकर 109.59 रुपये प्रति लीटर हो गया है। इससे फैक्टरियां, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बहुत बढ़ गई है।
महंगाई का असर घरों तक पहुंच रहा है। कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। जोमैटो ने भी अपनी प्लेटफॉर्म फीस 12.50 रुपये से बढ़ाकर 14.90 रुपये कर दी है, यानी हर ऑर्डर पर 2.40 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ेंगे।
लेकिन सवाल यह है कि जब सब कुछ कच्चे तेल पर ही निर्भर है तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई कितनी बाधित हुई है? इससे एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का करीब 20% तेल और LNG गुजरती है। यानी रोजाना 2 करोड़ बैरल। इसका 80-84% हिस्सा एशिया में भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया को जाता है। हमलों के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर दिया। वहीं सऊदी, इराक और कुवैत में तेल उत्पादन घट गया है।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अब तक का सबसे बड़ा कदम उठा चुकी है, 40 करोड़ बैरल तेल रिजर्व से छोड़ने का प्लान। फिर भी एशिया में ईंधन की कमी और महंगाई का खतरा मंडरा रहा है।
एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं अगर होर्मुज पूरी तरह बंद रहा या जंग लंबी चली तो कीमतें 130-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। गोल्डमैन सैक्स ने कहा कि अगर सप्लाई 21 दिन तक सिर्फ 10% रही तो कीमतें ऊंची रहेंगी। EIA ने 2026 का अनुमान बढ़ाकर ब्रेंट को 79 डॉलर औसत पर रखा, लेकिन शॉर्ट टर्म में 100-120 आसानी से टूट सकता है। IEA के रिजर्व रिलीज से कुछ राहत मिलेगी, लेकिन लंबा संकट ग्लोबल महंगाई और आर्थिक मंदी ला सकता है।
RBI उठा सकता है ये कदम
कोटक सिक्योरिटीज के अनिंद्य बनर्जी ने कहा कि शायद 94 पर RBI भारी मात्रा में हस्तक्षेप कर सकता है, यानी बहुत सारे डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अभी बाजार में डॉलर बेचने वाला मुख्य रूप से सिर्फ RBI ही है। वहीं इंडिया फॉरेक्स के अभिषेक गोयनका ने कहा कि रुपया हर तरफ से दबाव झेल रहा है विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, कच्चा तेल महंगा है और बाजार का मूड भी कमजोर है।
उनका कहना है कि अगर तेल 100 डॉलर से ऊपर बना रहा तो 93 का स्तर ठीक है, लेकिन अगर तेल वापस 80 डॉलर पर आ गया तो रुपया जल्दी ही 90-91 तक पहुंच सकता है।
पिछले 100 दिनों से ज्यादा में रुपया 90 से गिरकर 93 पर आ गया है। यानी गिरावट तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट अब खुद-ब-खुद और तेज हो रही है, क्योंकि महंगा तेल और दुनिया की अनिश्चितता से दबाव बना हुआ है। RBI लगातार हस्तक्षेप तो कर रहा है, लेकिन स्थिति मुश्किल बनी हुई है।
चीन इस संकट से कैसे अछूता?
चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, लेकिन उसे कम नुकसान हो रहा है। वजह: उसके पास 1.2 से 1.4 अरब बैरल का विशाल रिजर्व है यानी 3-4 महीने की जरूरत। घरेलू तेल उत्पादन ज्यादा है, रूस से पाइपलाइन से तेल आ रहा है जो प्रभावित नहीं हुआ है। कोयला उसकी ऊर्जा का आधा से ज्यादा हिस्सा है और इलेक्ट्रिक कारों व रिन्यूएबल एनर्जी से तेल पर निर्भरता कम हो गई। तेल सिर्फ 20% ऊर्जा मिक्स में है।
जापान या दक्षिण कोरिया की तरह चीन की अर्थव्यवस्था तेल पर इतनी निर्भर नहीं। कुछ ईरानी तेल अभी भी पहुंच रहा है और सऊदी तेल रेड सी रूट से रीडायरेक्ट हो रहा है। नतीजा चीन के पड़ोसी देशों से बेहतर स्थिति में है।
मिडिल ईस्ट की अर्थव्यवस्था पर क्या असर?
अल जरीरा की रिपोर्ट के मुताबिक जंग ने गल्फ देशों को बुरी तरह झकझोरा है। सऊदी अरामको की सबसे बड़ी रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ, कतर में एलएनजी उत्पादन रुक गया। तेल निकासी बंद होने से राजस्व घाटा हुआ, टूरिज्म और बिजनेस प्रभावित। मिस्र जैसे देशों में इन्फ्लेशन बढ़ा और अर्थव्यवस्था ‘इमरजेंसी’ जैसी स्थिति में है। तेल निर्यातक देशों को हाई प्राइस से कुछ फायदा हो सकता था, लेकिन उत्पादन और शिपिंग रुकने से नुकसान ज्यादा हुआ।
ऐसे में इस नुकसान की भरपाई के लिए ये देश संभव है कि तेल की कीमतों में इजाफा कर दें। क्योंकि इन देशों के पास ट्रेड के लिए कच्चा तेल ही एकमात्र ऐसा प्रोडेक्ट है, जिसकी पूरी दुनिया को जरूरत है। जंग के कारण शिपिंग कंपनियों ने इंश्योरेंश कॉस्ट भी बढ़ा दी है, जिसका बोझ आयातक देशों पर पड़ रहा है।
रूस और अमेरिका को फायदा कैसे?
पश्चिम एशिया में तनाव में रूस सबसे बड़ा विजेता बन गया है। खाड़ी देशों से तेल रुकने से भारत और चीन ने रूसी तेल ज्यादा खरीदा। उराल्स क्रूड का डिस्काउंट खत्म हो गया और कीमत ब्रेंट के बराबर पहुंच गई। रोजाना 15 करोड़ डॉलर अतिरिक्त कमाई हुई।
अमेरिका के पक्ष में यह है कि वो दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है, हाल ही में वेनेजुएला के तेल संसाधनों को नियंत्रण में लेने के बाद से। शेल ऑयल कंपनियों एक्सॉन, शेवरॉन आदि को 63 अरब डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा हुआ है। एलएनजी एक्सपोर्ट पर भी फायदा। राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद कह चुके हैं कि “तेल महंगा होने से अमेरिका को पैसा मिल रहा है।”











