इस्राइल और अमेरिका के ईरान पर किए गए हमले और ईरान के मध्य पूर्व में जवाबी हमले से उपजे हालात में खाड़ी में बसे भारतवंशियों की सुरक्षा की चिंता वाजिब है। मगर मोदी सरकार ने जिस तरह से अमेरिका और इस्राइल की साझा कार्रवाई का परोक्ष समर्थन कर ईरान से दूरी बनाई है भारत के दूरगामी हितों के लिए ठीक नहीं है।
28 फरवरी को इस्राइल और अमेरिका ने ईरान पर तब हमला किया, जब प्रधानमंत्री मोदी को इस्राइल की दो दिन की यात्रा के बाद तेल अवीव से स्वदेश रवाना हुए 48 घंटे भी नहीं हुए थे।
जाहिर है, अमेरिका और इस्राइल ने हमले की तैयारी पहले से कर रखी थी और ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी की यात्रा के दौरान इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतनान्यूह ने इस बारे में क्या उन्हें किसी भी तरह से अवगत नहीं कराया था।
अंतरराष्ट्रीय संधियों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए किए गए इस साम्राज्यवादी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बावजूद अब तक न तो प्रधानमंत्री मोदी और न ही विदेश मंत्रालय की ओर से ईरानी लोगों के लिए कोई संदेश जारी किया गया है।
इसके उलट प्रधानमंत्री ने एक्स पर बताया है कि उन्होंने नेतन्याहू से बात कर हालात का जायजा लिया और नागरिकों की सुरक्षा पर बात की। इसी तरह उन्होंने यूएई के राजकुमार से भी बात की।
आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति तटस्थ रही है, बल्कि नेहरू तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता था।
ईरान से दूरी बनाकर मोदी सरकार ने खासतौर से युद्ध लंबा चलने की स्थिति में तेल आयात के अपने विकल्प सीमित कर लिए हैं, क्योंकि हमारा पचास फीसदी तेल होरमुज जलडमरू मध्य के रास्ते से ही आता है और अमेरिकी दबाव में हमने रूस से पहले ही तेल लेना कम कर दिया है।











