प्रशासन या कार्पोरेट का लठैत?

February 16, 2026 9:16 PM
Development in Chhattisgarh

लोकतंत्र में विकास की कीमत क्या होनी चाहिए? लोकतंत्र में प्रशासन को किसके हक में खड़ा रहना चाहिए? क्या प्रशासन और सरकार उद्योगों के लठैत के रूप में खड़े नजर आएं या जनता के हक में मुस्तैद दिखने चाहिए?

क्‍या विकास की आंधी में ग्रामीणों, आदिवासियों, किसानों की चिंताओं को उड़ जाने देना चाहिए? इन सारे सवालों के जवाब छत्तीसगढ़ में निराश करने वाले मिलेंगे। जिस तरह की घटनाएं लगातार हो रही हैं उससे लगता है कि छत्तीसगढ़ में प्रशासन कार्पोरेट का लठैत ही बनता जा रहा है।

ताजा घटना में राज्‍य के बलरामपुर जिले में एक एसडीएम करुण डहरिया, नायब तहसीलदार पारस शर्मा और उनके साथियों द्वारा आदिवासी ग्रामीणों पर किए गए हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हैं। तीनों आदिवासी किसान खेत से सिंचाई कर रात में घर लौट रहे थे। अधिकारियों पर हत्‍या का मामला दर्ज किया गया है।

अधिकारी अवैध बॉक्साइट खनन की जांच के लिए गए थे। चर्चा यह है कि इस क्षेत्र में खनन का ठेका दिल्ली से लेकर रायपुर तक की सरकारों पर प्रभाव रखने वाले देश के एक बड़े कॉर्पोरेट घराने को देने की तैयारी है। ऐसे में प्रशासन पर अतिरिक्‍त दवाब है और अभी तक यह साफ नहीं है कि टीम किसकी शिकायत पर वहां जांच करने गई थी।

इससे पहले सरगुजा में कोयला खदान विस्तार के खिलाफ जन प्रदर्शन में टकराव के कारण आदिवासी ग्रामीण और पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं। इसी तरह रायगढ़ जिले में कोयला खदान परियोजना के विरोध में प्रदर्शन हिंसक हो गया, जहां वाहनों को आग लगाई गई और पुलिसकर्मी घायल हुए। हसदेव अरण्य क्षेत्र में अडानी की परसा कोयला खदान के लिए जंगल के सफाई के खिलाफ आदिवासियों पर पुलिस की लाठियां बरसीं, ढेरों ग्रामीण गिरफ्तार किए गए।

बस्तर में सलवा जुडूम के दौर से ही खनन कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन और हिंसा जारी है, जहां माओवाद के बहाने शांतिपूर्ण विरोध को कुचला जाता रहा है।

क्या औद्योगिक प्रगति के नाम पर आदिवासियों और किसानों पर ही कहर बरपाया जाएगा? क्या उन्हें उनकी जिंदगियों से बेदखल किया जाता रहेगा? छत्तीसगढ़, जो आदिवासी बहुल प्रदेश है, क्या पूरी तरह कॉर्पोरेट घरानों के कब्जे में सौंप दिया गया है? सरकार से लेकर प्रशासन तक सब पूंजी की ताकत के आगे इतना घुटने टेके नजर आते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल गए!

सत्ता कॉरपोरेट शिकंजे में मजबूर नजर आती है। यहां ग्राम सभाओं की हैसियत कठपुतली सी दिखने लगी है। उनकी राय को नजरअंदाज कर धड़ल्ले से भूमि अधिग्रहण किया जाता है। ग्रामीणों का विरोध सरकार की लाठी से कुचला जाता है। यह लोकतंत्र की विडंबना है कि विकास के पैरोकार खुद हिंसा के औजार बन रहे हैं।

जरूरी है कि विकास की इस दिशा पर बात की जाए, चिंता की जाए। देश भर में विमर्श हो नहीं तो छत्तीसगढ़, झारखंड या उड़ीसा जैसे राज्यों से जनता को बेदखल कर समाज के संसाधनों पर कॉरपोरेट कब्जा होगा और हम सरकारों को इनकी लठैती करते देखेंगे!फिर लोकतंत्र भी पुलिस की बूटों के नीचे कराहता नजर आएगा और वोट भी !

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