मोदी जी कहते रहे न खाऊंगा न खाने दूंगा बढ़ते रहे भ्रष्टाचार के मामले

नई दिल्ली। रामजन्म भूमि ट्रस्ट घोटाले के सामने आने के महज दो सप्ताह के भीतर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर सिंहस्थ कुम्भ के आयोजन के लिए किये जा रहे विकास कार्यों की आड़ में करोड़ों की जमीन के खरीद फरोख्त के आरोप लगे हैं।

दोनों ही आरोपों पर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व खामोश है। न तो प्रेस कांफ्रेंस की जा रही है न तो विपक्ष द्वारा इस्तीफे मांगने का विरोध किया जा रहा है न तो किसी किस्म की सफाई दी जा रही है। यह सवाल सभी की जुबान पर है कि जब उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में समय से पूर्व विधानसभा चुनाव कराने की योजना बन रही है तो वैसे में भाजपा इन आरोपों का मुकाबला करते क्यों नहीं नजर आ रही है? नहीं भुला जाना चाहिए कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्व में एक कार्यक्रम के दौरान साफ़ कहा था कि भाजपा में इस्तीफा नहीं होता।

जब लगा था अटल जी पर भ्रष्टाचार का आरोप

साल 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। एक बड़े मीडिया खुलासे में यह सामने आया था कि ‘डीलरशिप सिलेक्शन बोर्ड’ के जरिए आवंटित किए गए करीब 3,150 से अधिक पेट्रोल पंप, एलपीजी और केरोसिन की एजेंसियां भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं, कार्यकर्ताओं और उनके रिश्तेदारों को बांटी गई थीं। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के कुछ करीबियों और रिश्तेदारों के नाम भी इसमें सामने आए थे।

अटल बिहारी का भ्रष्टाचार से मुकाबला

विपक्ष के भारी हंगामे और इन आरोपों के बाद अपनी सरकार की छवि बचाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जनवरी 2000 के बाद से आवंटित किए गए सभी 3,158 पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों के आवंटन को तुरंत रद्द करने का कड़ा फैसला लिया था।

सरकार ने इसके बाद पुरानी आवंटन प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया और भविष्य के आवंटन के लिए पारदर्शी खुली नीलामी की नीति लागू की।यह दीगर है कि अटल जी की सरकार पर बाद में कई गंभीर आरोप लगे लेकिन अटल जी भ्रष्टाचार को लेकर अंत तक जीरो टोलरेंस की नीति की बात करते रहे।

मोदीराज में भ्रष्टाचार से मुकाबले पर खामोश बीजेपी

2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो उनका यह जुमला बेहद प्रसिद्द हुआ कि न खाऊंगा न खाने दूंगा। विपक्ष के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कथित मामलों को लेकर ईडी और सीबीआई के ताबड़तोड़ छापे पड़ने लगे, गिरफ्तारियां होने लगी। लेकिन ग़जब यह हुआ कि अपनी पार्टियों को छोड़ने और तोड़ने वाले नेताओं को बड़े बड़े पद दिए गए।

भ्रष्टाचार के मामलों में जिन्हें सजाएं मिलनी चाहिए थी उनमे से कई मुख्यमंत्री बना दिए गए। पत्रकार आदित्य सिंह कहते हैं कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हें वहां ईडी नहीं होती मध्य प्रदेश में तो पता ही नहीं लगता ईडी है या नही है। ग़जब यह रहा कि भ्रष्टाचार के ज्यादातर गंभीर आरोपों को भाजपा ने विपक्ष की दुर्भावना बताकर खारिज कर दिया। हांलाकि हाल के दोनों घोटालों पर फिलहाल बीजेपी खामोश है।

मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के कौन कौन से आरोप

पिछले 12 वर्षों के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार पर विपक्ष और विभिन्न संगठनों द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मुख्य आरोपों की बात करतें हैं :

इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bonds) विवाद: विपक्ष ने इसे “आधिकारिक भ्रष्टाचार” का नाम दिया। आरोप लगाया गया कि इसके जरिए शेल कंपनियों और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के डर से कंपनियों से चंदा लिया गया। कंपनियों के नाम भी सामने आये। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इलेक्टोरल बांड को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

राफेल डील विवाद: फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में विमानों की कीमत बढ़ाने और नियमों को ताक पर रखकर एक निजी भारतीय उद्योगपति को ऑफसेट पार्टनर बनाने का आरोप लगा। राहुल गांधी और विपक्ष ने जमकर आरोप लगाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट और CAG ने इसमें किसी गड़बड़ी से इनकार किया था।

अडानी समूह और हिंडनबर्ग रिपोर्ट: जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद विपक्ष ने सरकार पर अडानी समूह को अनुचित लाभ पहुंचाने, नियमों में ढील देने और बंदरगाहों, हवाई अड्डों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों का ठेका देने का आरोप लगाया। अडानी समूह पर अमेरिका में फ्राड के आरोप लगे तो सरकार ने सम्मन तक तामिल नहीं कराया।

PM CARES फंड की पारदर्शिता: कोविड-19 महामारी के दौरान बनाए गए इस फंड को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसे CAG ऑडिट और RTI के दायरे से बाहर रखकर पारदर्शिता से समझौता किया गया।

एजेंसियों का दुरुपयोग (वाशिंग मशीन का आरोप): विपक्ष का लगातार आरोप रहा है कि ED, CBI और आयकर विभाग का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को डराने के लिए किया जाता है और भाजपा में शामिल होते ही उन नेताओं के खिलाफ मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं।

नोटबंदी: 2016 की नोटबंदी को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसके जरिए बड़े पैमाने पर काले धन को सफेद करने का खेल हुआ और आम जनता को परेशान किया गया।

कांग्रेस ने महज आरोपों पर लिए इस्तीफे

यह नही भुला जाना चाहिए कि आजादी के बाद से कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के महज आरोपों पर इस्तीफे लिए हैं। कथित कोयला और कैग घोटाले की वजह से मनमोहन सिंह की सरकार चली गई जो कि बाद में झूठे साबित हुए। आजादी के बाद से कांग्रेस ने अपने तीन मुख्यमंत्रियों और एक दर्जन से ज्यादा केन्द्रीय मंत्रियों भ्रष्टाचार के आरोपों पर इस्तीफा लिया है। ये भी नहीं भुला जाना चाहिए सिर्फ आरोपों पर ही असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा से राहुल गांधी ने दूरी बना ली। कांग्रेस द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपों पर लिए गए इस्तीफों की एक लम्बी फेहरिस्त है।

कांग्रेस ने कब कब किसका किसका लिया इस्तीफा

आजादी के बाद से तीन मुख्यमंत्रियों और दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों का इस्तीफा कांग्रेस ने इसी बिनाह पर लिया।

प्रताप सिंह कैरो (पंजाब): वर्ष 1964 में दास आयोग की रिपोर्ट में भाई-भतीजावाद और पद के दुरुपयोग के आरोप सही पाए जाने के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया था।

ए. आर. अंतुले (महाराष्ट्र): वर्ष 1982 में इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान ट्रस्ट के लिए बिल्डरों से जबरन धन उगाही (सीमेंट घोटाला) के आरोप में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था।

अशोक चव्हाण (महाराष्ट्र): वर्ष 2010 में मुंबई के चर्चित ‘आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले’ में नाम आने और अपनों को फ्लैट आवंटित कराने के आरोपों के बाद कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर उन्होंने पद छोड़ा था।

स्वतंत्रता के बाद से कांग्रेस और उसके समर्थित गठबंधनों में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफा देने वाले प्रमुख केंद्रीय मंत्रियों की सूची भी सुनिए :

टी. टी. कृष्णमाचारी (1958): स्वतंत्र भारत का पहला बड़ा घोटाला माने जाने वाले ‘मूंदड़ा कांड’ (एलआईसी द्वारा हरिदास मूंदड़ा की कंपनियों के शेयर अवैध तरीके से खरीदने का मामला) के बाद नेहरू कैबिनेट के वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दिया।

के. डी. मालवीय (1963): सिराजुद्दीन एंड कंपनी नाम की एक निजी फर्म से कांग्रेस उम्मीदवार के लिए पैसे लेने के आरोपों के बाद नेहरू मंत्रिमंडल के खान और ईंधन मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

सुखराम (1996): नरसिम्हा राव सरकार में संचार मंत्री रहे सुखराम के ठिकानों से सीबीआई ने करोड़ों रुपये नकद बरामद किए थे, जिसके बाद टेलीकॉम घोटाले के आरोपों में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

ए. राजा (2010): यूपीए-2 सरकार में डीएमके कोटे से दूरसंचार मंत्री थे। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में नाम आने और कैग (CAG) की रिपोर्ट के बाद भारी दबाव में इस्तीफा दिया। बाद में आरोप फर्जी साबित हुए

दयानिधि मारन (2011): यूपीए-2 सरकार में कपड़ा मंत्री रहे मारन पर आरोप था कि उन्होंने केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रहते हुए एयरसेल-मैक्सिस सौदे में दबाव बनाया, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

पवन कुमार बंसल (2013): यूपीए-2 सरकार के रेल मंत्री थे। उनके भांजे को रेलवे बोर्ड में प्रमोशन दिलाने के बदले कथित तौर पर ₹90 लाख की रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने पकड़ा था जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दिया।

अश्विनी कुमार (2013): यूपीए-2 सरकार में कानून मंत्री थे। कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) घोटाले की सीबीआई जांच रिपोर्ट में कथित तौर पर मंत्रालय स्तर पर बदलाव या हस्तक्षेप करने के आरोपों के कारण विवादों में घिरे और इस्तीफा दिया। यह आरोप भी झूठे साबित हुए।

वीरभद्र सिंह (2012): यूपीए-2 सरकार में केंद्रीय सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम मंत्री थे। शिमला की एक अदालत द्वारा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामले में आरोप तय किए जाने के बाद पद से इस्तीफा दिया।

शिबू सोरेन (2004)- केंद्रीय कोयला मंत्री पद से इस्तीफा। हत्या मामले में वारंट जारी होने और गिरफ्तारी से बचने के बाद PM मनमोहन सिंह ने इस्तीफा मांगा। वह फरार भी रहे थे। झारखंड CM पद से भी इन्होंने कई बार इस्तीफा दिया

नटवर सिंह (2005) – पूर्व विदेश मंत्री और कांग्रेस नेता थे। UN की Oil-for-Food Programm में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। रिपोर्ट में नटवर सिंह और कांग्रेस पार्टी को फायदा मिलने की बात सामने आई। आरोप था कि उनके बेटे और परिवार को लाखों बैरल तेल का गैरकानूनी फायदा मिला। Volcker रिपोर्ट आने के बाद जांच के लिए विदेश मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में कांग्रेस से भी निलंबित हुए।

यानी की पिछले 12 सालों में, जब से NDA सरकार है, एक बात बार-बार साफ दिख रही है – सरकार सामूहिक जिम्मेदारी लेने से कतरा रही है। हर बार दोषी व्यक्ति, अधिकारी या ठेकेदार पर कार्रवाई होती है, लेकिन सरकार की सामूहिक और नैतिक जिम्मेदारी दिखाई नहीं देती। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की पहचान उसकी जवाबदेही से होती है। बड़े-बड़े दावे, भव्य भाषण और ड्रीम प्रोजेक्ट तो बहुत हैं लेकिन जब सवाल उठता है कि हजारों युवा, मजदूर और आम नागरिक क्यों अपनी जान गंवा रहे हैं, क्यों परेशान हैं तो न्यूनतम जवाबदेही भी नजर नहीं आती।

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