नई दिल्ली। ‘कोयला घोटाला मामले में सीबीआई अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह फेल रही।‘ यह टिप्पणी करते हुए राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष सीबीआई जज सुनीना शर्मा ने पूर्व सांसद विजय दर्डा, उनके बेटे देवेंद्र दर्डा, पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता, एमआर आईरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और उसके डायरेक्टर मनोज कुमार जयसवाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
यह कोयला घोटाले के सबसे पुराने लंबित मामलों में से एक था, जिसकी सुनवाई 11 साल से ज्यादा चली। फैसले के बाद सभी आरोपियों को सम्मानजनक बरी किया गया।
जज शर्मा ने टिप्पणी की कि आरोपी व्यक्तियों के बीच किसी आपराधिक साजिश का सीधा या परोक्ष कोई भी सबूत नहीं मिला, बल्कि मामला महज अनुमानों पर टिका था।
कोर्ट के अनुसार, “आरोपियों के बीच किसी प्रकार की आपराधिक साजिश साबित करने के लिए एक भी ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं है।” इसलिए अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), धारा 420 (धोखाधड़ी) के साथ उसकी पढ़ते हुए, और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 9 तथा 13(1)(d) के तहत सभी आरोपों से सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
यह मामला महाराष्ट्र के बंदर कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा था। सीबीआई ने 2012 में एफआईआर दर्ज की थी और 2014 में चार्जशीट दाखिल की। अभियोजन पक्ष का दावा था कि कंपनी ने कोयला मंत्रालय को आवेदन में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए, अपनी वित्तीय स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर बताया और लोकमत ग्रुप तथा आईएलएंडएफएस से जुड़ाव का झूठा दावा किया। साथ ही स्क्रीनिंग कमिटी के सामने गुमराह करने वाली जानकारी पेश की गई।
दर्दा परिवार पर आरोप था कि उन्होंने आवंटन प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए सिफारिशें कीं, जबकि पूर्व सचिव एचसी गुप्ता पर यह आरोप कि उन्होंने कंपनी द्वारा पूरी जानकारी न देने की अनदेखी की। लेकिन कोर्ट ने पाया कि आवंटन की प्रक्रिया एक नीतिगत फैसला थी, जो उच्चस्तरीय पैनल और प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देशों के अनुसार हुई थी।
जज शर्मा ने कहा कि एमआर कंपनी और सरकारी अधिकारियों के बीच कोई संवाद या संपर्क साबित नहीं हुआ। “परिस्थितियों के आधार पर साजिश साबित करने के सभी प्रयास सबूतों की कमी के कारण विफल रहे।”











