ये न्याय नहीं है मी लार्ड!

CJI Suryakant

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेरोजगारों को लेकर जो टिप्पणी की है, वह दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ ही बेहद पीड़ादायक है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, कुछ युवा कॉकरोच की तरह हैं, जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता और न ही किसी पेशे में जगह मिलती है। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया, आरटीआई कार्यकर्ता और दूसरे एक्टिविस्ट बन जाते हैं, और फिर सब पर हमला करने लगते हैं। इसके साथ ही जस्टिस सूर्यकांत ने ऐसे बेरोजगारों को परजीवी तक करार दिया।

उनकी यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर वकील के दर्जे से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने कहा कि बहुत से फर्जी डिग्रीधारी वकील हैं, जिनकी सीबीआई से जांच होनी चाहिए।

बेशक, फर्जी या गैरकानूनी डिग्रियों को लेकर मुख्य न्यायाधीश की चिंता वाजिब है। तब तो और जब, इस समय देश में गलत तरीके से नीट का पर्चा हासिल कर मेडिकल क़ॉलेजों में दाखिले की कोशिश कर रहे संगठित गिरोह का पता चला है। फर्जी या गैरकानूनी डिग्रियों पर सख्ती होनी ही चाहिए, फिर वह किसी की भी क्यों न हो।

मगर तकलीफ इस सुनवाई के दौरान की गई जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी से हुई है, जिन्होंने बेरोजगारों को आड़े हाथ लेते हुए मीडिया, सोशल मीडिया, आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता इन सबको लपेटे में ले लिया। इससे कहां इनकार है कि इन क्षेत्रों में गड़बड़ियां हैं। मगर क्या न्यायपालिका इससे अछूती है?

दरअसल बेरोजगारों या किसी के लिए भी ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल न तो मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा के अनुकूल है और न ही देश के किसी भी नागरिक की गरिमा के अनुकूल।

मी लार्ड, क्या ऐसी सख्त टिप्पणी सरकार के लिए भी करेंगे, जिसकी बुनियादी जिम्मेदारी देश के बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने से भी जुड़ी है, और जो इसे पूरा नहीं कर पा रही है। सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह लोगों को रोजगार मुहैया कराए। मगर जैसा कि मनरेगा के मामले में ही देखा जा सकता है कि किस तरह से उसमें मिली रोजगार की संवैधानिक गारंटी को निशाने पर ले लिया गया और उसकी जगह लाई गई जी राम जी योजना में ऐसी कोई बाध्यता नहीं रही।

हाल ही में आए आंकड़े बता रहे हैं कि अप्रैल में देश में बेरोजगारी दर छह माह के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच कर 5.2 फीसदी हो गई और इसमें भी युवाओं की बेरोजगारी के आंकड़ों की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहाराया जाए?

क्या आपने सोचा है कि एक बेरोजगार को किस तरह की आर्थिक-सामाजिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। क्या आपने गौर किया कि आज नौकरी हासिल करना कितना मुश्किल हो गया है। काम मांगते हजारों युवाओं को अलग अलग मौकों पर लाठियों का सामना करना पड़ा है औऱ यह हाल-हाल की बात है। यही नहीं, रेलवे से लेकर सेना तक की भर्तियों की परीक्षा देने के लिए जिस तरह से लाखों युवाओं को ट्रेनों में ठूस कर जाना पड़ता है, क्या वह किसी से छिपा है।

जिस देश में युवाओं को डेमोग्राफिक डिविडेंट की तरह देखा जा रहा है, वहां उनकी क्षमता को पहचानने की जरूरत है। युवा इस देश की उम्मीद हैं, कॉकरोच नहीं। गांधी ने तो यहां तक कहा था कि घृणा अपराध से करो अपराधियों से नहीं। और ये तो सिर्फ बेरोजगार हैं, काम मांग रहे हैं।

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