बालाघाट में मरते रहे बच्चे, सोती रही सरकार

बालाघाट से स्वतंत्र पत्रकार नितेश उचबगले ने द लेंस के लिए ये जानकारी पहुंचाई है

Balaghat के वनांचल में रहने वाले आदिवासियों को दशकों के ‘लाल आतंक’ से पिछले साल मुक्ति मिली ही थी कि उनके शरीर पर किसी अभिशाप की तरह लाल चकत्ते उभरना शुरू हो गए। शुरू में उन्होंने भी इसे दैवीय प्रकोप ही माना, फिर बुखार चढ़ा तो पहले से कुपोषित शरीर ने चिकित्सा सेवाओं के अभाव में जवाब देना शुरू कर दिया। जून में पहले बच्चे की मौत हुई। अब बच्चों की मौत का आंकड़ा 30 के पार जा चुका है। राज्य को नक्सलमुक्त घोषित कर के अपनी पीठ थपथपा चुकी सरकार मलेरिया से हलकान है। गजब यह है कि इस मामले से निपटने के बजाय मीडिया मैनेजमेंट की कोशिश की जा रही है। पिछले दिनों जब सीजेपी के अभिजीत दीपिके बालाघाट पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे उनके पीछे सरकार समर्थित भोपाल से यूट्यूबर छोड़ दिए गए।

नक्सलवाद का आतंक खत्म बीमारियों का शुरू

मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला हमेशा से नक्सलवाद के नाम पर ही सुर्खियों में रहा है। पिछले साल दिसंबर में जब अंतिम दो माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्य को नक्सलमुक्त घोषित किया, तब उन्हें शायद बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि इस जिले के आदिवासियों के सिर पर लाल सियासी आतंक से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा मंडरा रहा था—लाल चकत्ते का आतंक।

मरते रहे बच्चे सोता रहा महकमा –   दिसंबर 2025 में ही कई पत्रकारों का ध्यान नक्सलवाद से हटकर वहां के आदिवासियों पर पड़ा था। उम्र के हिसाब से कम वजन और कम कद यानी कुपोषण के शिकार आदिवासी बच्चों के शरीर पर खुजली के निशान दिखे थे। स्थानीय पत्रकारों ने जिला कलेक्टर को इसकी जानकारी दी। स्वास्थ्य विभाग ने शिविर भी लगाए, लेकिन वे कुछ दिन चले और फिर ध्यान नहीं दिया गया। जून में बच्चों की मौतें शुरू हुईं।गांवों में बच्चे मरते रहे, लेकिन 120 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक आवाज नहीं पहुंची। जब आधिकारिक आंकड़ा तीन मौतों तक पहुंचा, तब प्रशासन गांवों तक गया। तब तक संक्रमण तेजी से फैल चुका था।

जून 2026 से शुरू हुआ  मौत का तांडव

अडोरी ग्राम पंचायत के कुंडेकसा, बोंदारी और कोरका गांवों में महामारी पहले से फैल रही थी। लोग झाड़-फूंक और पंडे-पुजारी के भरोसे थे। पहली मौत 16 जून 2026 को बोंदारी गांव में 16 साल के रूपलाल धुर्वे की हुई। दस दिन बाद 14 साल की लमनीन और उसके अगले दिन चार साल के साहिल की मौत हुई। उनके पिता सम्हारू धुर्वे ने बताया कि इलाज देर से हुआ। सरपंच परसराम धुर्वे को गंभीरता तब पता चली जब 23 जुलाई को तीन साल की प्रीति की मौत हुई। तब उन्होंने एसडीएम को सूचना दी। कुंडेकसा में अस्थायी अस्पताल बनाना पड़ा।

 कार्रवाई कम तबादले ज्यादा

10 अगस्त तक आधिकारिक मौतें सिर्फ छह बताई जा रही थीं। कांग्रेस विधायक संजय उइके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 19 मौतों की बात कही। इसके बाद हड़कंप मचा। आईसीएमआर की टीम ने जांच की तो खसरा (मीजल्स) और मलेरिया दोनों मिले। कुपोषण से कमजोर बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिला।

बैगा अंचल में हर छठा बच्चा कुपोषित है। टेक होम राशन (टीएचआर) बंद होने और पोषण आहार न मिलने के आरोप लगे। मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा का दावा था कि मलेरिया से कोई मौत नहीं हुई, जबकि रिकॉर्ड में कई मौतें मलेरिया से दर्ज हैं। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में कीटनाशक छिड़काव और मच्छरदानी नहीं पहुंची। अधिकारी का तबादला कर दिया गया। टीकाकरण के आंकड़ों पर भी सवाल उठे। सीएचएमओ डॉक्टर परेश उपलव का प्रभार छीन लिया गया और बाद में उन्हें हटा दिया गया।

न सड़क न पानी न स्वास्थ्य

प्रभावित गांवों में सड़क और साफ पानी नहीं है। पानी में एडिनो वायरस पाया गया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं हैं। एएनएम और नर्स सिफारिश से शहर ट्रांसफर हो जाते हैं। लोग बीमारी को ईश्वरीय प्रकोप मानकर पहले झाड़-फूंक करवाते हैं, डॉक्टर के पास देर से जाते हैं। चैन सिंह के बेटे सचिन को कई अस्पतालों में घुमाया गया, आखिर में महाराष्ट्र के निजी अस्पताल में मौत हो गई।

क्षतिपूर्ति या खानापूर्ति?

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और अन्य नेता क्षेत्र में पहुंचे। मुख्यमंत्री मोहन यादव 29 अगस्त को बोंदारी गांव गए, मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये दिए और बैगा विकास के लिए 2.25 करोड़ रुपये का ऐलान किया। विधायक संजय उइके ने कहा कि सभी बैगा गांवों को शामिल नहीं किया गया=गांव में फिलहाल स्वास्थ्य महकमा कैंप कर रहा है। जनता की मांग है कि मुआवजा बढ़ाया जाए, स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक हो और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। बंद से पहले नए सीएचएमओ नियुक्त कर दिए गए।

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